जशपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में रविवार को डिलिस्टिंग के विरोध में आदिवासी समुदाय के लोगों ने एक विशाल प्रदर्शन किया। इस दौरान भारी संख्या में एकजुट हुए प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर उतरकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की और आरोप लगाया कि डिलिस्टिंग की मांग आदिवासियों को आपस में बांटने और संविधान की पांचवीं अनुसूची को समाप्त करने की एक सोची-समझी साजिश है।
इस विरोध प्रदर्शन और रैली का आयोजन राजी पड़हा समिति द्वारा ईसाई आदिवासी महासभा के सहयोग से किया गया था। आंदोलन में शामिल होने के लिए सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग रांची रोड स्थित शासकीय एनईएस कॉलेज मैदान में एकत्र हुए। इसके बाद कड़कती धूप की परवाह न करते हुए और हाथों में छतरियां व बैनर थामे प्रदर्शनकारी डिलिस्टिंग विरोधी नारे लगाते हुए आगे बढ़े। यह रैली शहर के जैन मंदिर, बस स्टैंड, महाराजा चौक, जय स्तंभ चौक और भागलपुर चौक से होते हुए अंत में बीटीआई ग्राउंड पहुंची, जहाँ यह एक बड़ी सभा में तब्दील हो गई।
इस दौरान कुनकुरी के पूर्व विधायक और कांग्रेस जिलाध्यक्ष यूडी मिंज ने सभा को संबोधित करते हुए केंद्र और अन्य संगठनों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि दिल्ली में जनजातीय सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित की जा रही सभाएं आदिवासियों को बांटने की साजिश का हिस्सा हैं। भारतीय संविधान देश के आदिवासियों को अपनी इच्छा से किसी भी धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता देता है। उन्होंने आंकड़े साझा करते हुए दावा किया कि जशपुर जिले में लगभग 24 प्रतिशत आबादी ईसाई समुदाय की है। अगर यहाँ डिलिस्टिंग को लागू किया जाता है, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर संविधान की पांचवीं अनुसूची पर पड़ेगा, जिससे अंततः पूरे आदिवासी समाज को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।
वहीं दूसरी ओर, ईसाई आदिवासी महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अनिल किस्पोट्टा ने भी डिलिस्टिंग की मांग पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आदिवासियों को अपनी आस्था और धर्म चुनने का संवैधानिक अधिकार है, और डिलिस्टिंग के बहाने पांचवीं अनुसूची को समाप्त करने का खेल खेला जा रहा है। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान मंच से विभिन्न वक्ताओं ने आदिवासी संस्कृति की रक्षा के लिए छत्तीसगढ़ में ‘सरना धर्म कोड’ को जल्द से जल्द लागू करने की मांग भी प्रमुखता से उठाई।

