आदिवासी अंचलों में कुछ इस तरह मनता है फगुआ” ……………..
होली का त्योहार आते ही अब बाजारों में चीनी प्लास्टिक की बंदूकों, मोटराइज्ड वॉटर गन्स और न जाने कितने तरह के फैंसी गैजेट्स की बाढ़ आ जाती है। लेकिन इस चमक-धमक के बीच, गाँव की वह पारंपरिक बांस की पिचकारी कहीं ओझल हो गई है। वह पिचकारी, जो सिर्फ एक खिलौना नहीं, बल्कि हुनर और अपनेपन का प्रतीक थी।
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वो बांस का हुनर और देसी जुगाड़
कुछ दशक पहले तक, होली से हफ़्तों पहले गाँवों में हलचल शुरू हो जाती थी। बच्चे और बुजुर्ग मिलकर पास के बांस के झुरमुटों से सीधा और खोखला बांस चुनकर लाते थे। इसे बनाने की प्रक्रिया अपने आप में एक उत्सव थी:
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बांस को काटकर उसे भीतर से साफ किया जाता था।
पिस्टन का निर्माण: एक पतली लकड़ी के सिरे पर पुराने कपड़ों या जूट की कतरन लपेटकर ‘पिस्टन’ बनाया जाता था, ताकि दबाव सही बने।
धार का आनंद: जब उस बांस की पिचकारी से केसरिया या टेसू के फूलों के रंग की धार निकलती थी, तो उसकी मार आधुनिक प्लास्टिक की पिस्तौलों से कहीं ज्यादा दमदार और संतोषजनक होती थी।
आधुनिकता का प्रहार: प्लास्टिक बनाम प्रकृति
आज की आधुनिक पिचकारियों ने सुविधा तो दी है, लेकिन कई अनमोल चीजें छीन ली हैं:
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पर्यावरण का नुकसान: बांस की पिचकारी पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल (प्रकृति में घुलने वाली) थी। आज की प्लास्टिक पिचकारियां होली के अगले दिन कचरे के ढेर में तब्दील होकर पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं।
स्थानीय रोजगार का अंत: पहले गाँव के कारीगर इन्हें बनाकर दो पैसे कमा लेते थे, अब सारा मुनाफा बड़ी कंपनियों और विदेशी बाजारों की जेब में जा रहा है।
मिट्टी से जुड़ाव: बांस की पिचकारी बनाने में जो मेहनत और रचनात्मकता लगती थी, उसने बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ा था। आज ‘क्लिक एंड बाय’ की संस्कृति ने उस मौलिक आनंद को खत्म कर दिया है।
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क्या हम वापस लौट सकते हैं?
होली ‘हुड़दंग’ का नहीं, ‘हृदय’ का त्योहार है। अगर हम अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं, तो हमें फिर से उन पुरानी परंपराओं को सम्मान देना होगा। बांस की पिचकारी सिर्फ एक वस्तु नहीं थी, वह हमारे कुटीर उद्योग और शून्य-अपशिष्ट (Zero Waste) जीवनशैली का हिस्सा थी।
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आधुनिकता जरूरी है, लेकिन वह हमारी विरासत की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। इस बार की होली में क्यों न हम फिर से उसी पुरानी बांस की पिचकारी को तलाशें और अपनी आने वाली पीढ़ी को उस देसी आनंद से रूबरू कराएं?
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