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उच्च शिक्षा में समानता लाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए इक्विटी नियम अब देशभर में नए सिरे से बहस का केंद्र बनते जा रहे हैं। 15 जनवरी 2026 से प्रभावी हुए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ को जहां सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे लेकर असहमति और आशंकाएं भी खुलकर सामने आने लगी हैं। खासतौर पर जनरल कैटेगरी के छात्रों और कुछ सामाजिक संगठनों में इन नियमों को लेकर असंतोष बढ़ता नजर आ रहा है।

इसी कड़ी में    युवा अधिवक्ताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन से मुलाकात कर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। अधिवक्ताओं का कहना है कि नए नियम संविधान में निहित समानता और समान अवसर की भावना के विपरीत जा सकते हैं। अधिवक्ता आनंद शुक्ल के नेतृत्व में सौंपे गए ज्ञापन में यह चिंता जताई गई कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बनाए गए ये प्रावधान अगर संतुलन के बिना लागू किए गए, तो वे योग्यता और निष्पक्षता के सिद्धांतों को प्रभावित कर सकते हैं।

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अधिवक्ताओं और विरोध कर रहे संगठनों का तर्क है कि इतने व्यापक बदलाव बिना व्यापक संसदीय बहस और सामाजिक सहमति के लागू करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भावना के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि भेदभाव रोकने की मंशा सराहनीय है, लेकिन इसके नाम पर ऐसे प्रावधान बनना, जिनका दुरुपयोग संभव हो, शिक्षा व्यवस्था में भय और अविश्वास का माहौल पैदा कर सकता है।

नए नियमों के तहत अब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समानता समिति गठित करना अनिवार्य किया गया है, जिसमें विभिन्न सामाजिक वर्गों और महिलाओं के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट यूजीसी को सौंपेगी। इसके अलावा एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ की स्थापना भी अनिवार्य कर दी गई है, ताकि किसी भी तरह के भेदभाव की शिकायत का निपटारा किया जा सके।

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हालांकि, नियम लागू होते ही विरोध के स्वर भी तेज हो गए हैं। कुछ संगठनों का मानना है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल व्यक्तिगत या संस्थागत स्तर पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। इसी आशंका के चलते जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया है, ताकि इस मुद्दे पर संगठित तरीके से अपनी बात रखी जा सके।

दूसरी ओर यूजीसी ने साफ कर दिया है कि नए इक्विटी नियमों का पालन अनिवार्य होगा। आयोग ने चेतावनी दी है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें यूजीसी की योजनाओं से बाहर करना, कोर्स बंद करना, ऑनलाइन और डिस्टेंस एजुकेशन पर रोक लगाना और यहां तक कि मान्यता रद्द करना भी शामिल है।

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यूजीसी के अनुसार, किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव की स्थिति में पीड़ित छात्र, शिक्षक या कर्मचारी हेल्पलाइन, ईमेल, ऑनलाइन पोर्टल या लिखित शिकायत के जरिए अपनी बात रख सकते हैं। गंभीर मामलों में शिकायत सीधे पुलिस को भेजी जाएगी। यदि कोई शिकायतकर्ता संस्थान की इक्विटी समिति के निर्णय से संतुष्ट नहीं होता है, तो वह एक महीने के भीतर ऑम्बड्समैन के पास अपील कर सकता है। यूजीसी पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा और यह सुनिश्चित करने के लिए कॉलेजों व विश्वविद्यालयों का रैंडम निरीक्षण भी करेगा कि नियम सही ढंग से लागू हो रहे हैं।

कुल मिलाकर, नए इक्विटी नियमों ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है। एक ओर इन्हें सामाजिक समानता की दिशा में बड़ा सुधार बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि कहीं यह बदलाव योग्यता और निष्पक्षता के संतुलन को प्रभावित न कर दे। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह व्यवस्था शिक्षा प्रणाली को मजबूत करती है या विवादों को और गहरा करती है।

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