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गुमला/जशपुर:
झारखंड और उससे सटे छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले सहित पूरे छोटा नागपुर पठार के ग्रामीण अंचलों से एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की तस्वीर सामने आई है, जो आधुनिक दुनिया के ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ जैसी दिखती तो है, लेकिन इसके पीछे की वजह कोई आज़ाद ख्याली नहीं बल्कि कमरतोड़ गरीबी है। इस अनोखी और दर्दनाक परंपरा को स्थानीय भाषा में ‘ढुकू’ प्रथा कहा जाता है। इस अंचल में हज़ारों ऐसे गरीब परिवार हैं, जहाँ युवक-युवती बिना शादी किए ही दशकों से एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं, बच्चे पाल रहे हैं और इसी स्थिति में बूढ़े हो रहे हैं। सामाजिक और आर्थिक विवशता के कारण शुरू हुआ यह साथ कई बार उनकी पूरी जिंदगी का अकेला सच बन जाता है।
इस अनोखी परंपरा के जन्म लेने और इसके बने रहने के पीछे की सबसे बड़ी वजह यहाँ के आदिवासी समाजों और विभिन्न जातियों में प्रचलित कड़े वैवाहिक नियम हैं। इन परंपराओं के अनुसार, यदि कोई जोड़ा पारंपरिक विधि-विधान से शादी करता है, तो उसे पूरे गांव को एक बड़ा और खर्चीला सामूहिक भोज (दावत) देना अनिवार्य होता है। दिनभर मेहनत-मजदूरी करके जैसे-तैसे अपना पेट पालने वाले अत्यंत गरीब परिवारों के लिए इस भारी-भरकम खर्च का तुरंत इंतजाम करना पूरी तरह नामुमकिन होता है। ऐसी स्थिति में समाज और आर्थिक तंगी के आगे बेबस होकर युवक-युवती बिना शादी के ही एक घर में साथ रहने लगते हैं। वे इस उम्मीद में अपनी जिंदगी की शुरुआत करते हैं कि पाई-पाई जोड़कर जब कभी पर्याप्त पैसे जमा हो जाएंगे, तब समाज को भोज देकर अपनी इस शादी को सामाजिक मान्यता दिलाएंगे, लेकिन अक्सर गरीबी के कारण यह इंतज़ार सालों-साल लंबा खिंच जाता है।
बिना शादी के इस तरह साथ रहने की जो सामाजिक और कानूनी कीमत इन जोड़ों और उनके बच्चों को चुकानी पड़ती है, वह बेहद डरावनी है। वर्षों साथ रहने और नाती-पोते हो जाने के बाद भी समाज इन जोड़ों को पति-पत्नी का दर्जा नहीं देता है और न ही इन्हें अपने ही परिवार की पैतृक जमीन-जायदाद में कोई कानूनी हिस्सा या मालिकाना हक मिल पाता है। इस प्रथा की सबसे क्रूर मार इन जोड़ों से जनमी मासूम संतानों पर पड़ती है। शादी की वैधता न होने के कारण इन बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र नहीं बन पाता, जिससे सरकारी स्कूलों में उनका नामांकन कराने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। आधार कार्ड, राशन कार्ड और सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी व छात्रवृत्ति योजनाओं का लाभ भी इन बच्चों तक नहीं पहुँच पाता, जिससे इनका भविष्य बचपन से ही अंधकारमय हो जाता है। अमानवीयता की हद तो तब हो जाती है जब इस प्रथा में रहने वाले किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो समाज उन्हें गांव के पारंपरिक मुक्तिधाम या कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार तक की जगह नहीं देता।
इन्हीं तमाम विसंगतियों, मानसिक प्रताड़ना और मानवाधिकारों के हनन को देखते हुए अब इस पूरे अंचल में एक मौन सामाजिक क्रांति करवट ले रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले विभिन्न सामाजिक संगठन और नवयुवक संघ अब इन ‘ढुकू’ जोड़ों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने और उन्हें सम्मान दिलाने के लिए आगे आ रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के तहत समय-समय पर बड़े स्तर पर सामूहिक विवाह कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इस अनूठी पहल से न केवल इन बुजुर्ग और अधेड़ हो चुके जोड़ों को समाज में सिर उठाकर जीने का हक मिला है, बल्कि उनके बच्चों के माथे से भी हमेशा के लिए एक सामाजिक कलंक मिट गया है, जिससे अब वे जमीन के हक और सभी सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

