मोहब्बत का ‘देसी वर्जन’: जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा श्रृंगार और सरई ही सबसे बड़ा उपहार है
मोहब्बत का ‘देसी वर्जन’: जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा श्रृंगार और सरई ही सबसे बड़ा उपहार है
जशपुर। जशपुर जिले की भौगोलिक विविधता इन दिनों एक अनोखे प्राकृतिक विरोधाभास को जन्म दे रही है। जिले के दो हिस्सों—नीच घाट और ऊपर घाट के बीच महज चंद किलोमीटर का फासला है, लेकिन यहाँ कुदरत की रफ़्तार में जमीन-आसमान का अंतर साफ देखा जा सकता है। जहाँ निचले इलाकों में वसंत ने अपनी दस्तक दे दी है, वहीं ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अब भी शीत ऋतु का प्रभाव बना हुआ है।
जशपुर के नीच घाट में शामिल कुनकुरी, दुलदुला, कांसाबेल, पत्थलगांव और फरसाबाहर जैसे क्षेत्रों में प्रकृति ने अपनी चादर बदल ली है। यहाँ आम, महुआ और सरई के पेड़ों पर भारी मात्रा में फूल लद गए हैं। यहाँ की हवाओं में महुआ की मादक गंध घुलने लगी है और आम लीची व कटहल के पेड़ों में आई बौर ने किसानों के चेहरे पर रौनक ला दी है। इन इलाकों की बढ़ती गर्मी ने पेड़ों को समय से पहले ही पुष्पित होने का संकेत दे दिया है।
इसके ठीक विपरीत, जशपुर के ऊपर घाट की तस्वीर बिल्कुल अलग है। लोरो घाट की चढ़ाई से लेकर जशपुर मनोरा, सन्ना, पंडरपाठ, दनगिरी और प्रसिद्ध कैलाश गुफा तक के विस्तृत क्षेत्र में पेड़ों पर अभी फूलों का नामोनिशान तक नहीं है। यहाँ की वनस्पति अभी भी सुप्त अवस्था में है और पेड़ों की डालियाँ फूलों के भार से मुक्त हैं। इस सन्नाटे का सबसे बड़ा कारण यहाँ के तापमान में रहने वाली गिरावट है।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: नीति से नेतृत्व तक, आंकड़ों में देखिए कैसे सशक्त हो रही है देश की लाडली!
विशेषज्ञों और स्थानीय निवासियों के अनुसार, नीच घाट और ऊपर घाट के तापमान में औसतन 5 से 7 डिग्री सेल्सियस का बड़ा अंतर पाया जाता है। यही वह तापीय अंतर है जो जशपुर को दो अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में बाँट देता है। जब नीचे के इलाकों में लोग गर्मी महसूस करने लगते हैं और पेड़ों पर फल आने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, उस वक्त ऊपर घाट की ठंडी हवाएं वसंत के आगमन को रोके रखती हैं।
भविष्य का ‘ब्लू गोल्ड’ रिजर्व: “मरुस्थल होते राज्यों के बीच ‘वॉटर सरप्लस’ छत्तीसगढ़
यह भौगोलिक घटना जशपुर के कृषि और व्यापार के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। तापमान के इस अंतर की वजह से जिले में फलों का सीजन काफी लंबा खिंचता है। जहाँ नीच घाट की फसलें जल्दी तैयार होकर बाजार की रौनक बढ़ाती हैं, वहीं ऊपर घाट की फसलें देरी से पककर तब बाजार में आती हैं जब बाकी जगहों पर सीजन खत्म होने वाला होता है। जशपुर का यह ‘क्लाइमेट डिवाइड’ न केवल शोध का विषय है, बल्कि यह सैलानियों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण है जो एक ही दिन में दो अलग-अलग ऋतुओं का अहसास कर सकते हैं।
सरकारी स्कूलों में ‘कॉन्वेंट’ जैसा लुक: छत्तीसगढ़ के 60 लाख बच्चों को मिलेगी नई यूनिफॉर्म

