फैजान अशरफ

छत्तीसगढ़ की माटी को अगर उत्तर में जशपुर और सरगुजा की हरी-भरी वादियों से लेकर दक्षिण में बस्तर के पठार तक, और पूर्व में बहने वाली ईब नदी से लेकर पश्चिम की जीवनरेखा इंद्रावती नदी तक देखा जाए, तो यह पूरा भूभाग प्राकृतिक वैभव और संस्कृति का एक जीवंत दस्तावेज़ नज़र आता है।

सरगुजा के पहाड़ों से लेकर गरियाबंद के घने जंगलों तक फैला यह राज्य जहाँ एक ओर अपनी समृद्ध जैव-विविधता से देश को प्राणवायु देने वाले फेफड़ों की तरह काम करता है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी विकास, औद्योगिक विस्तार और आधुनिकता की होड़ में प्रकृति को सहेजने की गंभीर चुनौतियों से भी जूझ रहा है।

विश्व पर्यावरण दिवस के इस मोड़ पर छत्तीसगढ़ के पर्यावरण का निष्पक्ष आकलन करने के लिए हमें यहाँ के सकारात्मक, नकारात्मक और संतुलित, तीनों पक्षों को बहुत गहराई से समझना होगा।

इस समूचे परिदृश्य का सबसे सुंदर और सकारात्मक पक्ष यहाँ की सघन वन संपदा और सदियों पुरानी जनजातीय संस्कृति का अटूट रिश्ता है। बस्तर के अबूझमाड़ से लेकर सरगुजा और जशपुर के दूरस्थ अंचलों तक फैला आदिवासी समाज हमेशा से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की मिसाल रहा है। यहाँ जंगलों, पहाड़ों और नदियों को सिर्फ उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवनदाता मानकर पूजा जाता है।

जशपुर का इलाका बिना किसी बड़े व्यावसायिक खनिज खनन के आज भी अपनी शांत वादियों, घाटियों और प्राकृतिक जलप्रपातों की अनूठी सुंदरता को समेटे हुए है, तो वहीं गरियाबंद का उदंती-सीतानदी और बस्तर की कांगेर घाटी जैसे राष्ट्रीय उद्यान दुर्लभ वन्यजीवों और वनस्पतियों के सुरक्षित ठिकाने हैं।स्थानीय ग्रामीणों और वनाश्रित समुदायों का यही पारंपरिक ज्ञान और जंगलों के प्रति उनका लगाव ही इस राज्य की असली पर्यावरणीय ताकत है, जो पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।

लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू कुछ कड़वी और नकारात्मक सच्चाइयों से भी भरा हुआ है, जहाँ बदलती जीवनशैली और विकास की प्राथमिकताओं ने प्रकृति को गहरे घाव दिए हैं। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में छिपी असीमित खनिज संपदा का अनियंत्रित दोहन और उत्खनन पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। इस भारी उत्खनन के साथ-साथ इमारती लकड़ियों और औद्योगिक कच्चे माल की मांग को पूरा करने के लिए होने वाली जंगलों की व्यावसायिक कटाई ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है।

व्यावसायिक लाभ के लिए हरे-भरे वनों की इस अंधाधुंध कटाई से सदियों पुराने प्राकृतिक जंगल मरुस्थल और एकरस बंजर भूमि में बदल रहे हैं। जंगलों के इस विनाश और उनके बीच से गुजरते बड़े हाईवे या कॉरिडोर जैसे विकास कार्यों के चलते हज़ारों पुराने पेड़ों की आहुति दी गई है, जिसका सबसे दर्दनाक नतीजा हाथी-मानव द्वंद्व के रूप में सामने आ रहा है।

वनों के इस बिखराव और व्यावसायिक दोहन के साथ-साथ हर साल गर्मियों में लगने वाली जंगल की आग (दावानल) बची-खुची जैव-विविधता, छोटे वन्यजीवों और अनमोल जड़ी-बूटियों को जलाकर खाक कर रही है।

तस्वीर का एक और चिंताजनक हिस्सा हमारी जीवनदायिनी नदियों और औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़ा है। ईब नदी से लेकर इंद्रावती नदी तक, और महानदी, शिवनाथ,अरपा,कन्हर पैरी-सोढूर जैसी तमाम नदियों से होने वाला अवैध और अत्यधिक रेत खनन इनके प्राकृतिक स्वरूप को पूरी तरह नष्ट कर रहा है।

रेत के इस अंधाधुंध उठाव के कारण नदियों के जल धारण करने की क्षमता खत्म हो रही है और वे समय से पहले ही सूखने लगी हैं। इसके साथ ही, राज्य के विभिन्न अंचलों में स्थापित बड़ी और छोटी फैक्ट्रियों के कारण पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला ज़हरीला धुआँ जहाँ हवा को प्रदूषित कर रहा है, वहीं इनसे निकलने वाला रासायनिक कचरा और दूषित पानी बिना शोधन के सीधे स्थानीय नदी-नालों में बहाया जा रहा है। इस औद्योगिक प्रदूषण के कारण आस-पास की कृषि भूमि बंजर हो रही है, भूजल स्तर ज़हरीला हो रहा है और ग्रामीण आबादी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रही है।

इन दोनों विपरीत छोरों के बीच एक तीसरा पक्ष भी है, जो संतुलन और भविष्य की एक नई राह दिखाता है। आज के दौर में सड़कों, बिजली, फैक्ट्रियों और आधुनिक सुविधाओं की आवश्यकता से पूरी तरह मुंह नहीं मोड़ा जा सकता, लेकिन इस विकास और औद्योगिक प्रगति की कीमत पर प्रकृति का पूरी तरह विनाश भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। यही वजह है कि अब नीतिगत स्तर पर पर्यावरण और प्रगति के बीच संतुलन बनाने की कोशिशें की जा रही हैं।

जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए स्थानीय स्तर पर छोटे नदी-नालों के संरक्षण का काम हो रहा है, और जंगलों पर इंसानी दबाव को कम करने के लिए इको-टूरिज्म तथा वनों पर आधारित पर्यावरण-अनुकूल रोजगारों को बढ़ावा दिया जा रहा है। फैक्ट्रियों पर कड़े पर्यावरणीय नियम लागू करना, व्यावसायिक वनों की कटाई की जगह टिकाऊ वानिकी अपनाना, रेत खनन की सख्त निगरानी करना, जंगल की आग पर काबू पाने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल और बुनियादी परियोजनाओं के निर्माण के साथ-साथ अनिवार्य और प्रभावी वृक्षारोपण को कड़ाई से लागू करना अब समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।

अंततः, ईब से इंद्रावती तक कलकल बहती नदियां और सरगुजा से गरियाबंद होते हुए जशपुर व बस्तर की वादियों में लहराते जंगल ही छत्तीसगढ़ की वास्तविक पहचान और धरोहर हैं। इस पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ी सीख यही है कि आर्थिक प्रगति की ऊंचाइयों को छूने की चाहत में हमें अपनी ज़मीन, नदियों और जंगलों की इस नैसर्गिक शांति को नहीं खोना है।

जब तक हर नागरिक, उद्योगपति और प्रशासनिक व्यवस्था विकास के फैसलों में प्रकृति की सुरक्षा को सर्वोपरि नहीं रखेगी, तब तक एक पूर्ण हरित छत्तीसगढ़ की कल्पना अधूरी रहेगी। पर्यावरण को बचाना अब महज़ एक दिन की रस्म नहीं, बल्कि इस समूचे प्रदेश के अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का सबसे अनिवार्य संकल्प है।

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