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छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य झारखंड में भी हाथियों की लगातार हो रही मौतें अब गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं। जंगलों के तेजी से सिमटने, खनन परियोजनाओं के विस्तार, रेलवे लाइन और हाईटेंशन बिजली तारों के जाल ने हाथियों के प्राकृतिक आवास को तहस-नहस कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ कि हाथी अब जंगल छोड़कर गांवों, खेतों और बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं, जहां टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। यह संकट अब केवल वन्यजीव संरक्षण का नहीं, बल्कि मानव जीवन, आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।
झारखंड के कोल्हान क्षेत्र, सारंडा जंगल, रांची, सरायकेला-खरसावां, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम जैसे इलाकों में हाथियों की मौजूदगी वर्षों से रही है। लेकिन बीते दो दशकों में यहां बड़े पैमाने पर खनन, सड़क और रेल परियोजनाओं ने उनके प्राकृतिक गलियारों को तोड़ दिया। हाथियों के पारंपरिक रास्ते बंद होने से वे गांवों में घुसने लगे हैं, जिससे फसलें नष्ट हो रही हैं और मानव-हाथी संघर्ष लगातार बढ़ रहा है।
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भारतीय वन्यजीव संस्थान और पर्यावरण मंत्रालय के प्रोजेक्ट एलीफेंट की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2000 से 2023 के बीच झारखंड में 225 से अधिक हाथियों की मौत दर्ज की गई। इनमें से 150 से ज्यादा मौतें सीधे तौर पर मानव गतिविधियों से जुड़ी रहीं। बिजली के करंट, ट्रेन की चपेट में आना, जहर, अवैध शिकार और विस्फोट जैसे कारणों से हाथियों ने जान गंवाई। इसी अवधि में हाथियों के हमलों में 1,300 से अधिक लोगों की मौत हुई, जो यह दर्शाता है कि यह संघर्ष दोनों पक्षों के लिए जानलेवा बन चुका है।

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झारखंड के सारंडा जंगल में हाल के वर्षों में माओवादियों द्वारा लगाए गए आईईडी विस्फोटों में हाथियों की मौत ने हालात की गंभीरता को और उजागर किया। इसके अलावा बिजली के खुले तार हाथियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। पिछले दो दशकों में अकेले झारखंड में करंट से दर्जनों हाथियों की मौत हो चुकी है। ट्रेन हादसों में भी कई हाथी मारे गए हैं, क्योंकि रेलवे ट्रैक उनके पुराने मूवमेंट कॉरिडोर पर बनाए गए हैं।
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स्थिति छत्तीसगढ़ में भी उतनी ही भयावह है। सरगुजा, जशपुर, रायगढ़, कोरबा, बलरामपुर और कांकेर जैसे जिलों में हाथियों की लगातार आवाजाही देखी जा रही है। यहां खनन, जंगल कटाई और औद्योगिक गतिविधियों ने हाथियों को गांवों की ओर धकेल दिया है। वर्ष 2024-25 में छत्तीसगढ़ में 15 से अधिक हाथियों की मौत दर्ज की गई, जबकि 2025 में अब तक यह आंकड़ा और बढ़ चुका है। कई मामलों में पूरे परिवार के हाथी मारे गए, जिससे वन्यजीव प्रेमियों और प्रशासन दोनों में चिंता बढ़ गई है।


मानव पक्ष की बात करें तो हालात और भी चिंताजनक हैं। झारखंड और छत्तीसगढ़ में 2021 से 2025 के बीच हाथियों के हमलों में सैकड़ों ग्रामीणों की जान जा चुकी है। खेतों की रखवाली करते किसान, जंगल से लकड़ी लाने गए ग्रामीण और रात में घरों के बाहर निकले लोग अचानक हाथियों का शिकार बन रहे हैं। इससे आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में भय का माहौल है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है। हाथी कॉरिडोर को कानूनी सुरक्षा देना, हाईटेंशन तारों को भूमिगत करना, रेलवे ट्रैक पर अंडरपास बनाना, ग्रामीणों को समय पर मुआवजा देना और जंगलों के अंधाधुंध कटाव पर रोक लगाना बेहद जरूरी है।

हाथी केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि जंगलों की पारिस्थितिकी के स्तंभ हैं। उनका संरक्षण प्रकृति के संतुलन के लिए अनिवार्य है। झारखंड और छत्तीसगढ़ में जिस तरह से हालात बिगड़ रहे हैं, वह चेतावनी है कि अगर विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हाथियों को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।
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