विशेष संवाददाता, रायपुर
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य व्यवस्था एक गंभीर संकट से जूझ रही है। प्रदेश के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में फार्मासिस्टों की भारी कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में दवा प्रबंधन और वितरण की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। मरीजों को दवा कब, कैसे, खाली पेट या भोजन के बाद लेनी है और किस दवा के साथ क्या परहेज करना है—इसकी सही जानकारी देने वाला कोई नहीं है। फार्मासिस्टों की अनुपस्थिति में अनधिकृत और अप्रशिक्षित स्टाफ द्वारा दवाएं बांटी जा रही हैं, जो मरीजों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ और बेहद जोखिम भरा है।
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आंकड़ों की जुबानी: स्वीकृत पदों का टोटा और बेरोजगारी का दोहरा वार
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रशासकीय प्रतिवेदन (2025-26) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। प्रदेश में कुल 6,290 शासकीय स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन इनके अनुपात में फार्मासिस्टों के स्वीकृत पद पहले से ही ऊंट के मुंह में जीरे के समान (सिर्फ 1,568) हैं। चिंताजनक बात यह है कि इन स्वीकृत पदों में से भी लगभग 37 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं।
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कुल स्वीकृत पद: 1,568
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कार्यरत फार्मासिस्ट: 990
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कुल रिक्त पद: 578
एक तरफ स्वास्थ्य केंद्र स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्रदेश के लगभग 40 हजार पंजीकृत फार्मासिस्ट लंबे समय से रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं।
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पदवार स्थिति पर एक नज़र
स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत विभिन्न ग्रेड के फार्मासिस्टों की वर्तमान स्थिति इस प्रकार है:
| पदनाम | स्वीकृत पद | कार्यरत | रिक्त पद |
| फार्मासिस्ट ग्रेड-1 | 23 | 13 | 10 |
| फार्मासिस्ट ग्रेड-2 | 1,465 | 948 | 517 |
| संचालनालय स्तर (ग्रेड-2) | 01 | 01 | 00 |
| स्टोर कीपर (भंडार भेषजज्ञ) | 79 | 28 | 51 |
| कुल योग | 1,568 | 990 | 578 |
(स्रोत : प्रशासकीय प्रतिवेदन 2025-26, छत्तीसगढ़)
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कानूनी संकट: जिम्मेदार अधिकारियों को हो सकती है जेल
इस लापरवाही के कारण स्वास्थ्य विभाग पर एक बड़ा कानूनी संकट भी मंडरा रहा है। फार्मेसी अधिनियम-1948 की धारा 42 के तहत किसी भी डॉक्टर के पर्चे (Prescription) पर दवाओं का वितरण केवल और केवल एक पंजीकृत फार्मासिस्ट ही कर सकता है।
इसके अलावा, जन-विश्वास अधिनियम के नए नियमों के तहत यदि किसी अस्पताल में अनधिकृत या अप्रशिक्षित व्यक्ति से दवाओं का वितरण कराया जाता है, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ तीन महीने तक के कारावास और दो लाख रुपये तक के जुर्माने का कड़ा प्रावधान है। इस कानूनी पचड़े से बचने के लिए नियमित पदों को तत्काल भरा जाना अनिवार्य हो गया है।
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मानकों की अनदेखी: WHO और PCI के नियम हवा में
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के मानकों के अनुसार, शासकीय अस्पतालों में बिस्तरों और मरीजों की संख्या के आधार पर फार्मासिस्टों की तैनाती अनिवार्य है:
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50 बिस्तर वाले अस्पताल में: 3 फार्मासिस्ट
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100 बिस्तर वाले अस्पताल में: 5 फार्मासिस्ट
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200 बिस्तर वाले अस्पताल में: 8 फार्मासिस्ट
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ओपीडी (OPD) में: प्रति 100 से 150 पर्चियों पर 1 फार्मासिस्ट।
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आईपीडी/आईसीयू (IPD/ICU) में: प्रति 30 से 50 मरीजों पर 1 फार्मासिस्ट।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में इन अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मानकों की सरेआम अनदेखी हो रही है, जिससे स्टॉक प्रबंधन और दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने में बड़ी रुकावट आ रही है।
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केंद्रीय सेवा विनियम-2025 को लागू करने की मांग
इंडियन फार्मासिस्ट एसोसिएशन (IPA) ने इस संकट को दूर करने के लिए मोर्चा खोल दिया है। एसोसिएशन ने केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित फार्मासिस्ट भर्ती, पदोनवति और सेवा विनियम-2025 को छत्तीसगढ़ में तत्काल लागू करने की मांग की है।
एसोसिएशन की प्रमुख मांगें:
पुराने नियमों को बदलकर केंद्रीय राजपत्र के तहत उच्चतर वेतनमान (लेवल-7 से 12) के साथ नए राजपत्रित पद लागू किए जाएं।
रिक्त पड़े 578 पदों पर भर्ती और पदोन्नति के लिए वित्त विभाग तत्काल बजट आवंटित करे।
राज्य के सभी 6,290 स्वास्थ्य केंद्रों की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार नए पदों को सैद्धांतिक मंजूरी दी जाए।
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विभागों के आपसी तालमेल की कमी से फंसा पेंच
“राज्य में फार्मेसी शिक्षा ‘तकनीकी शिक्षा मंत्रालय’ के अधीन आती है, जबकि फार्मासिस्ट का पद ‘स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय’ के अंतर्गत आता है। मंत्रालयों के इसी दोहराव और तालमेल की कमी के कारण फार्मासिस्टों के रोजगार और करियर उन्नयन में एक गहरी खाई बन गई है। इस विसंगति को दूर करने के लिए आईपीए जल्द ही राज्य शासन से उच्च स्तरीय वार्तालाप करेगा।”
— राहुल वर्मा, प्रदेश सचिव, आईपीए छत्तीसगढ़

