नई दिल्ली: गृह मंत्रालय ने जनगणना (संशोधन) नियम, 2026 की अधिसूचना आधिकारिक राजपत्र में जारी कर दी है, जिसके साथ ही आगामी जनगणना के लिए गणनाकर्मियों यानी एन्यूमरेटरों की नियुक्ति का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो गया है। वैसे तो पारंपरिक रूप से सरकारी शिक्षक और कर्मचारी ही जनगणना का काम संभालते आए हैं, लेकिन इस बार नियमों में बड़ा और नया बदलाव करते हुए इसके दायरे को काफी व्यापक बनाया गया है। नए नियमों के तहत सरकारी शिक्षकों के साथ-साथ मान्यता प्राप्त निजी (प्राइवेट) शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को भी आधिकारिक रूप से एन्यूमरेटर या सुपरवाइजर के रूप में नियुक्त किए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा केंद्र व राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के कर्मचारी, स्थानीय निकायों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) तथा स्वायत्त संस्थानों के अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ-साथ प्रशासनिक आवश्यकता पड़ने पर अन्य उपयुक्त प्रशिक्षित व्यक्तियों को भी इस राष्ट्रीय कार्य की जिम्मेदारी सौंपी जा सकेगी। राजपत्र में प्रकाशन के साथ ही ये नियम तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं।
देशभर में चलने वाले इस वृहद अभियान के दौरान इन फील्ड कर्मचारियों की मुख्य भूमिका घर-घर जाकर या डिजिटल माध्यमों से नागरिकों से सटीक आंकड़े जुटाने की होगी। चूँकि भारत की आगामी जनगणना पूरी तरह डिजिटल और आधुनिक तकनीक पर आधारित होने जा रही है, इसलिए एन्यूमरेटरों को मोबाइल ऐप और विशेष जनगणना पोर्टल के जरिए पूरी तरह पेपरलेस तरीके से डेटा फीड करना होगा। यह पूरी प्रक्रिया दो मुख्य चरणों में पूरी की जाएगी; पहले चरण में मकानों की सूची बनाने के साथ आवास की सुविधाओं से जुड़े आंकड़े जुटाए जाएंगे, जबकि दूसरे चरण में प्रत्येक नागरिक की सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय जानकारी दर्ज की जाएगी। इसके साथ ही नागरिकों द्वारा ऑनलाइन खुद भरी गई जानकारियों (सेल्फ-एनुमेरेशन) का मौके पर जाकर सत्यापन करना भी इन्हीं की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा होगा।
जनगणना के दौरान जुटाई जाने वाली ये जानकारियां देश के समग्र विकास, भविष्य की योजनाओं और नीति-निर्माण की मुख्य रीढ़ होती हैं। इन प्रामाणिक आंकड़ों के आधार पर ही सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का खाका तैयार करती है जिससे समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुँचाया जा सके। देश के वित्तीय संसाधनों का सही आवंटन, राज्यों के लिए बजट का निर्धारण, सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों का क्रियान्वयन और लोकसभा तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करना भी पूरी तरह से इसी जनगणना डेटा पर निर्भर करता है।


