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| विशेष रिपोर्ट
अगर आप सोचते हैं कि जामुन केवल आपकी गर्मियों की यादों और सेहत का हिस्सा है, तो ठहरिए! एक ताज़ा वैज्ञानिक शोध ने जामुन के इतिहास को लेकर दुनिया भर की धारणाओं को पलट कर रख दिया है। अब तक जिसे विदेशी मूल का माना जाता था, उसका ‘जन्म प्रमाण पत्र’ भारत के प्राचीन जंगलों से निकला है।

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शोध की बड़ी बातें: ‘गोंडवाना’ कनेक्शन
बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP) के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने खुलासा किया है कि जामुन (सिज़ीगियम वंश) की उत्पत्ति लगभग **80 मिलियन (8 करोड़) साल पहले** ‘पूर्वी गोंडवाना’ में हुई थी। इसमें भारत ने एक केंद्रीय भूमिका निभाई है।

ऑस्ट्रेलिया नहीं, भारत से शुरू हुआ सफर

पहले माना जाता था कि जामुन की उत्पत्ति ऑस्ट्रेलिया या दक्षिण-पूर्व एशिया में हुई थी। लेकिन शोधकर्ताओं ने जब हिमाचल प्रदेश के कसौली फॉर्मेशन से मिले 20 मिलियन साल पुराने जीवाश्मों (Fossils) का बारीकी से अध्ययन किया, तो कहानी पूरी तरह बदल गई।

55 मिलियन साल पुराना इतिहास: भारत के पुराने रिकॉर्ड्स के पुनर्मूल्यांकन से पता चला कि यह प्रजाति **प्रारंभिक इओसीन काल (लगभग 5.5 करोड़ साल पहले) से ही भारतीय क्षेत्र में फल-फूल रही थी।

अध्ययन कहता है कि भारत से ही जामुन की प्रजातियाँ दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर फैलीं।

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हिमाचल से मिले 11 संरक्षित पत्तों के जीवाश्मों को वैज्ञानिकों ने’सिज़िजियम पैलियोसैलिसिफोलियम सदानंद, भाटिया एट श्रीवास्तव’ नाम दिया है।

वैज्ञानिकों ने माइक्रोस्कोप और आधुनिक सांख्यिकीय विधियों (Statistical Methods) का उपयोग किया। उन्होंने पत्तों के आकार, उनकी नसों (Veins) के पैटर्न और 22 अलग-अलग शारीरिक लक्षणों की तुलना दुनिया भर के डेटाबेस से की। इस जटिल प्रक्रिया के बाद ही यह साबित हो पाया कि भारत ही जामुन का असली ‘उद्गम स्थल’ है।

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यह सिर्फ एक फल की बात नहीं है, बल्कि यह एशियाई वनस्पति जगत के इतिहास को फिर से लिखने जैसा है। ‘जर्नल ऑफ पैलियोजियोग्राफी’ में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि: लाखों वर्षों में पौधों में आए बदलावों को समझकर हम भविष्य के जलवायु संकट का बेहतर अनुमान लगा सकते हैं। यह भारत को वैश्विक वनस्पति अनुसंधान के नक्शे पर और भी मजबूती से स्थापित करता है। पारिस्थितिक नियोजन और जैव विविधता को बचाने के लिए यह डेटा मील का पत्थर साबित होगा।

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अगली बार जब आप जामुन खाएं, तो गर्व महसूस करें। आप उस फल का स्वाद ले रहे हैं जिसका वजूद इस मिट्टी में डायनासोर के युग के आसपास से है!

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