क्या असुरक्षित है छत्तीसगढ़ का एडवेंचर? : केंद्र का ‘रेड सिग्नल’ ,राष्ट्रीय सूची में छत्तीसगढ़ का स्कोर ‘जीरो’, अब बिना कड़े नियमों के नहीं चलेगा एडवेंचर का खेल

फैज़ान अशरफ़

रायपुर: भारत में 2026 के बाद होने वाले देशव्यापी परिसिमन को लेकर छत्तीसगढ़ में अभी से रणनीतिक बिसात बिछने लगी है। जनसंख्या के नए आंकड़ों के आधार पर होने वाले इस बदलाव से राज्य की राजनीतिक भौगोलिक स्थिति में बड़े बदलाव की उम्मीद है।

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छत्तीसगढ़ में सीटों की संख्या में वृद्धि का सबसे मुख्य आधार यहाँ की तेजी से बढ़ती जनसंख्या और पुराना संवैधानिक ढांचा है। वर्तमान में राज्य की विधानसभा और लोकसभा सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर टिका हुआ है, जबकि पिछले पांच दशकों में प्रदेश की आबादी में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। 1971 के समय छत्तीसगढ़ की अनुमानित आबादी जो लगभग सवा करोड़ के आसपास थी, वह 2026 तक तीन करोड़ के आंकड़े को पार कर जाने की संभावना है। इसी जनसंख्या विस्फोट के कारण “समान प्रतिनिधित्व” के संवैधानिक अधिकार को बनाए रखने के लिए सीटों का विस्तार अनिवार्य हो गया है।

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विशेषज्ञों का अनुमान है कि जब 2026 के बाद नया परिसिमन आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा, तो वह प्रति निर्वाचन क्षेत्र जनसंख्या के एक नए मानक को आधार बनाएगा। यदि एक विधानसभा सीट के लिए ढाई से पौने तीन लाख की आबादी का पैमाना तय किया जाता है, तो छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटें स्वतः ही बढ़कर 110 से 120 के बीच पहुंच जाएंगी। इसी तरह, लोकसभा के मामले में भी वर्तमान की 11 सीटें राज्य की विशाल आबादी का प्रतिनिधित्व करने के लिए कम पड़ती दिख रही हैं, जिसके चलते इन्हें बढ़ाकर 13 या 14 किया जा सकता है।

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​इस वृद्धि का सबसे बड़ा असर राज्य के भौगोलिक राजनीति पर पड़ेगा। रायपुर, दुर्ग-भिलाई और बिलासपुर जैसे शहरी केंद्रों में आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा है, इसलिए सबसे ज्यादा नई सीटें इन्हीं मैदानी इलाकों में सृजित होंगी।

इसका एक अर्थ यह भी है कि राज्य की सत्ता का केंद्र ग्रामीण अंचलों से थोड़ा खिसक कर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की ओर झुक सकता है। इसके अलावा, चूंकि सीटों की कुल संख्या बढ़ेगी, इसलिए अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के आंकड़ों में भी आनुपातिक बदलाव आएगा। यह विस्तार न केवल नए राजनीतिक चेहरों के लिए दरवाजे खोलेगा, बल्कि महिला आरक्षण विधेयक के लागू होने के बाद सदन में महिलाओं की संख्या में भी बड़ी वृद्धि सुनिश्चित करेगा।

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पिछले दो दशकों में छत्तीसगढ़ की आर्थिक और सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव आया है, जिसका सीधा असर आने वाले परिसिमन में दिखाई देगा। रायपुर, दुर्ग, भिलाई और बिलासपुर जैसे प्रमुख शहरों ने रोजगार और सुविधाओं के चलते राज्य भर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है।

इस प्रवासन के कारण इन शहरों की जनसंख्या का घनत्व ग्रामीण इलाकों के मुकाबले कई गुना तेजी से बढ़ा है। जब परिसिमन आयोग सीटों का नए सिरे से निर्धारण करेगा, तो वह जनसंख्या को ही मुख्य पैमाना मानेगा। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि जिन शहरी क्षेत्रों में आबादी बढ़ी है, वहां विधानसभा की नई सीटें बनाई जाएंगी। उदाहरण के तौर पर, रायपुर या दुर्ग जैसे जिलों में अभी जितनी सीटें हैं, सीमाओं के पुनर्गठन के बाद वहां सीटों की संख्या में इजाफा होना लगभग तय है।

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​शहरी सीटों के बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों की सीमाओं में भी बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा। वर्तमान में कई ऐसी सीटें हैं जो आधी शहरी और आधी ग्रामीण हैं, लेकिन नए परिसिमन के बाद इन क्षेत्रों को अलग-अलग किया जा सकता है।

इससे ग्रामीण मतदाताओं का प्रभाव उन विशेष क्षेत्रों में कम हो सकता है जहाँ अब तक उनकी निर्णायक भूमिका रहती थी। कई पुराने ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र या तो पूरी तरह बदल जाएंगे या उनका अस्तित्व ही किसी नए शहरी क्षेत्र में विलीन हो जाएगा। यह प्रशासनिक और भौगोलिक बदलाव राज्य की पूरी चुनावी मैपिंग को बदल कर रख देगा।

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​इस बदलाव का सबसे गहरा असर राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली और उनकी रणनीति पर पड़ेगा। छत्तीसगढ़ की राजनीति पारंपरिक रूप से ‘किसान और ग्रामीण’ मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन भविष्य में राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करना होगा। उन्हें खेती-किसानी के साथ-साथ शहरी बुनियादी ढांचे, आईटी सेक्टर, प्रदूषण नियंत्रण और शहरी बेरोजगारी जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी।

अब तक जो पार्टियां केवल ग्रामीण वोट बैंक के भरोसे सत्ता तक पहुँचती थीं, उन्हें अब शहरी और अर्ध-शहरी मध्यम वर्ग को साधने के लिए नए एजेंडे तैयार करने पड़ेंगे। कुल मिलाकर, आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की सत्ता की चाबी उन शहरों के पास होगी जो राज्य की अर्थव्यवस्था की धड़कन बन चुके हैं।

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छत्तीसगढ़ की राजनीति में अनुसूचित जनजाति (ST) और अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीटें हमेशा से ही सत्ता की चाबी रही हैं। एक आदिवासी बहुल राज्य होने के नाते, यहाँ की 90 विधानसभा सीटों में से 29 सीटें आदिवासियों (ST) के लिए और 10 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं।

जब नया परिसिमन लागू होगा, तो संवैधानिक नियमों के अनुसार इन सीटों की संख्या का निर्धारण ताज़ा जनगणना के आधार पर किया जाएगा। बस्तर और सरगुजा जैसे संभाग, जो पूरी तरह से आदिवासी बेल्ट माने जाते हैं, वहाँ सीटों की संख्या और उनके भूगोल में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे तौर पर राज्य की सरकार बनाने के समीकरणों को प्रभावित करेगा।

यदि इन क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि की दर मैदानी इलाकों की तुलना में कम रहती है, तो रोटेशन पद्धति के तहत कुछ आरक्षित सीटों की सीमाओं में बड़ा बदलाव आ सकता है, जिससे राजनीतिक दलों के पुराने और जमे हुए समीकरण बिगड़ सकते हैं।

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​परिसिमन को लेकर एक बड़ी चिंता ‘प्रतिनिधित्व और जनसंख्या’ के संतुलन को लेकर भी है। दक्षिण भारतीय राज्यों में अक्सर यह बहस छिड़ती रही है कि जिन क्षेत्रों ने जनसंख्या नियंत्रण के सरकारी लक्ष्यों को सफलतापूर्वक हासिल किया है, उन्हें कम सीटें देकर दंडित नहीं किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में भी यह बहस प्रासंगिक हो सकती है।

यदि राज्य के कुछ विकसित हिस्सों में जनसंख्या नियंत्रण के कारण सीटों की संख्या स्थिर रहती है और अन्य हिस्सों में आबादी बढ़ने से सीटें बढ़ जाती हैं, तो राजनीतिक शक्ति का संतुलन उन क्षेत्रों की ओर झुक जाएगा जहाँ आबादी ज्यादा है।

हालांकि, छत्तीसगढ़ की स्थिति उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे बड़े राज्यों से काफी अलग है, क्योंकि यहाँ का एक बड़ा हिस्सा वनाच्छादित है और यहाँ की जनजातीय आबादी का अपना एक विशिष्ट जनसांख्यिकीय महत्व है।

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​बस्तर और सरगुजा संभाग की स्थिति इस पूरे मामले में सबसे संवेदनशील है। इन क्षेत्रों की राजनीतिक स्थिरता और जनजातीय हितों की रक्षा के लिए परिसिमन आयोग को विशेष ध्यान देना होगा। यदि परिसिमन के बाद आरक्षित सीटों की संख्या में कोई कमी आती है या उनके भौगोलिक स्वरूप में ऐसा बदलाव होता है जिससे जनजातीय प्रभाव कम हो, तो यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

छत्तीसगढ़ का राजनीतिक सफर वाकई में भारतीय लोकतंत्र की एक दिलचस्प यात्रा है। मध्य प्रांत और बरार के दौर से लेकर एक अलग राज्य बनने तक, यहाँ की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव और भौगोलिक बदलाव देखे हैं।

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​छत्तीसगढ़ का राजनीतिक एवं विधायी विकास (1951 – वर्तमान)
​छत्तीसगढ़ की राजनीति की नींव आजादी से पहले ही पड़ चुकी थी, लेकिन चुनावी लोकतंत्र की औपचारिक शुरुआत 1951 से हुई। सीटों की संख्या में बदलाव मुख्य रूप से जनसंख्या वृद्धि और समय-समय पर होने वाले परिसीमन (Delimitation) के कारण हुआ।

​विधानसभा सीटों का ऐतिहासिक सफ़र

विधानसभा सीटों के उतार-चढ़ाव का विश्लेषण

1951 – शुरुआती दौर (61 सीटें)
​यह वह समय था जब भारत में पहले आम चुनाव हुए थे। तब छत्तीसगढ़ ‘मध्य प्रांत और बरार’ (Central Provinces and Berar) का हिस्सा था। उस समय जनसंख्या कम थी, इसलिए मात्र 61 सीटों पर चुनाव संपन्न हुए।

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​1957 – सीटों में कमी (57 सीटें)
​1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ और छत्तीसगढ़ नए बने ‘मध्य प्रदेश’ का हिस्सा बना। इस प्रशासनिक फेरबदल और तत्कालीन परिसीमन के कारण सीटों की संख्या घटकर 57 रह गई। यह एकमात्र समय था जब सीटों में वृद्धि के बजाय कमी देखी गई।

1962 एवं 1967 – विस्तार का युग (81-83 सीटें)
​60 के दशक में जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई। लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुँचाने के लिए नए विधानसभा क्षेत्र बनाए गए।
​1962 में सीटें बढ़कर 81 हुईं।
​1967 में यह संख्या 83 तक पहुँच गई। अगले तीन दशकों तक छत्तीसगढ़ इसी ढांचे के आसपास संचालित होता रहा।

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2003 एवं 2008 – राज्य गठन और स्थिरता (90 सीटें)-​1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ एक स्वतंत्र राज्य बना। राज्य गठन के बाद:
​सीटों का नया निर्धारण किया गया और कुल संख्या 90 तय की गई।
​2003 में छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए पहला स्वतंत्र चुनाव इन्हीं 90 सीटों पर हुआ।

​2008 के परिसीमन में सीटों की कुल संख्या तो 90 ही रही, लेकिन कई क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाएं बदल गईं (जैसे कुछ सामान्य सीटें आरक्षित हो गईं और कुछ नई सीटों का जन्म हुआ)।

​परिसीमन (Delimitation) का प्रभाव

​परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत चुनाव आयोग जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय करता है। अब तक छत्तीसगढ़ के इतिहास में ​6 बार सीमाओं में बदलाव हो चुका है।
​7वां परिसीमन भविष्य में होने वाला है, जिससे सीटों की संख्या 90 से बढ़कर और अधिक होने की संभावना है।

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​याद रखें कि सीटों की संख्या का बढ़ना सीधे तौर पर बढ़ती हुई आबादी और बेहतर प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को दर्शाता है।

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में परिसीमन (Delimitation) एक ऐसी प्रक्रिया रही है जिसने कई रसूखदार और ऐतिहासिक विधानसभा क्षेत्रों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। साल 2008 के परिसीमन के दौरान राज्य की भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं में सबसे बड़ा बदलाव आया था।जिन सीटों का अस्तित्व खत्म हुआ उस के पीछे मुख्य कारण जनसंख्या का असंतुलन और नए जिलों का गठन था।

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अस्तित्व खोने वाली प्रमुख सीटें: एक Matching

सरगुजा और जशपुर अंचल (उत्तर छत्तीसगढ़)

​सूरजपुर और पिलखा: पहले सूरजपुर और पिलखा अलग-अलग प्रभाव रखते थे। परिसीमन के बाद सूरजपुर जिला तो बना, लेकिन चुनावी नक्शे में पिलखा जैसी सीटों का नाम बदलकर या उन्हें समाहित कर भटगांव और प्रेमनगर जैसी नई व्यवस्थाएं दी गईं।

​पाल: यह सीट सामरी और रामानुजगंज के क्षेत्रों में समाहित हो गई।

​बगीचा और तपकरा: जशपुर जिले की ये दो बेहद महत्वपूर्ण सीटें थीं। तपकरा “नागलोक” के नाम से मशहूर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती थी। अब ये सीटें मुख्य रूप से जशपुर और कुनकुरी विधानसभा में मर्ज हो चुकी हैं।

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बिलासपुर और जांजगीर अंचल (मध्य छत्तीसगढ़)

​सिपत: बिलासपुर की यह हाई-प्रोफाइल सीट थी। परिसीमन के बाद सिपत का अस्तित्व खत्म हुआ और इसका अधिकांश हिस्सा मस्तूरी और बिल्हा में चला गया।

​जरहागांव: यह मुंगेली जिले के अंतर्गत आती थी, जिसे अब मुंगेली सीट में शामिल कर लिया गया है।

​पामगढ़ और मालखरोदा: हालांकि पामगढ़ अभी भी अस्तित्व में है, लेकिन मालखरोदा का स्वरूप बदलकर अब इसे चंद्रपुर और जैजैपुर के साथ पुनर्गठित किया गया है।

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​रायपुर और दुर्ग अंचल (मैदानी इलाका)

​रायपुर शहर: पहले रायपुर शहर के नाम से एक ही प्रमुख सीट हुआ करती थी। जनसंख्या बढ़ने के कारण इसे तोड़कर रायपुर नगर दक्षिण, उत्तर, पश्चिम और ग्रामीण में विभाजित कर दिया गया।

​मंदिर हसौद और पल्लारी: रायपुर के पास की ये सीटें आरंग और बलौदाबाजार क्षेत्रों में विलीन हो गईं।

​धमधा और विरेन्द्र नगर: दुर्ग और कवर्धा क्षेत्र की ये सीटें बेहद पुरानी थीं। धमधा अब अहिवारा और साझा के बीच बंट गई है, जबकि विरेन्द्र नगर का हिस्सा पंडरिया और कवर्धा में समाहित है।

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​बस्तर अंचल (दक्षिण छत्तीसगढ़)

​भानपुरी और केसलूर: बस्तर की ये दोनों सीटें राजनीतिक रूप से बहुत सक्रिय थीं। परिसीमन के बाद इन्हें समाप्त कर बस्तर (सुरक्षित) और चित्रकोट विधानसभा क्षेत्रों को नया स्वरूप दिया गया।

​चौकी: राजनांदगांव जिले की मोहला-मानपुर-चौकी बेल्ट की इस सीट को अब मोहला-मानपुर के नाम से जाना जाता है।

​सीटें खत्म होने के मुख्य कारण
​आरक्षण का रोटेशन: कई सीटें जो पहले ‘सामान्य’ थीं, परिसीमन के बाद ‘आरक्षित’ (SC/ST) हो गईं, जिससे पुराने निर्वाचन क्षेत्रों का नाम बदल गया।

​ रायपुर और बिलासपुर जैसे शहरों की आबादी इतनी बढ़ी कि एक सीट को काटकर 3-4 नई सीटें बनानी पड़ीं।विकास कार्यों को गति देने के लिए दूरस्थ ग्राम पंचायतों को नजदीकी ब्लॉक मुख्यालय वाली विधानसभा से जोड़ा गया।

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​इन सीटों के खत्म होने से कई दिग्गज नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन बदलनी पड़ी। उदाहरण के लिए, रायपुर शहर के बंटवारे के बाद राजनीति पूरी तरह मोहल्लों और वार्डों के समीकरण पर टिक गई।

छत्तीसगढ़ की लोकतांत्रिक यात्रा में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों का समीकरण समय के साथ काफी बदला है। 1951 में जब मध्य प्रदेश अविभाजित था, तब छत्तीसगढ़ की कुल 61 सीटों में से केवल 8 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थीं। इसके बाद 1957 से अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था शुरू की गई।.

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​समय के साथ जनसंख्या और सामाजिक बदलावों के कारण इन सीटों की संख्या में वृद्धि हुई है। वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 सीटों में से 29 सीटें अनुसूचित जनजाति और 10 सीटें अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं।

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​आने वाले समय में नए परिसीमन को लेकर चर्चाएं तेज हैं। माना जा रहा है कि जनसंख्या के नवीनतम आंकड़ों और उनके अनुपात के आधार पर आरक्षित सीटों की संख्या में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। नए परिसीमन के बाद जहां कुछ आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है, वहीं कई वर्तमान आरक्षित सीटें सामान्य यानी अनारक्षित श्रेणी में भी शामिल हो सकती हैं।

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परिसिमन केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह इस बात का निर्धारण है कि आने वाले दशकों में छत्तीसगढ़ की विधानसभा में किन समुदायों और किन क्षेत्रों की आवाज सबसे बुलंद होगी। सत्ता का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक दल इन बदलते आरक्षित समीकरणों के बीच खुद को कितनी जल्दी और कितनी कुशलता से ढाल पाते हैं।

परिसिमन की प्रक्रिया को लेकर यह कहना बिल्कुल सटीक है कि यह केवल मानचित्र पर खिंची गई कुछ लकीरें भर नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले दशकों के लिए सत्ता की नई इबारत लिखने जैसा है। जब किसी निर्वाचन क्षेत्र की सीमाएं बदलती हैं, तो उसके साथ उस क्षेत्र का पूरा सामाजिक और जातीय समीकरण भी बदल जाता है। दशकों से एक ही सीट पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने वाले दिग्गज नेताओं के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है।

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कई बार ऐसा होता है कि परिसिमन के बाद किसी नेता का मुख्य वोट बैंक वाला इलाका काटकर दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में जोड़ दिया जाता है, जिससे उनका बना-बनाया ‘सेफ जोन’ रातों-रात असुरक्षित हो जाता है। ऐसे में कई बड़े राजनेताओं के पारंपरिक गढ़ ढह सकते हैं और उन्हें अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए नए और अपरिचित क्षेत्रों में संघर्ष करना पड़ सकता है।

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​दूसरी ओर, यही प्रक्रिया नए और उभरते हुए चेहरों के लिए एक सुनहरे अवसर की तरह आती है। नए निर्वाचन क्षेत्रों के सृजन से राजनीति में नए नेतृत्व को उभरने का मौका मिलता है। जो युवा नेता या क्षेत्रीय कार्यकर्ता सालों से बड़े दिग्गजों की छाया में दबे हुए थे, उन्हें परिसिमन के बाद बनी नई सीटों पर अपनी योग्यता साबित करने का स्वतंत्र मैदान मिल जाता है।

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यह बदलाव राजनीतिक दलों के भीतर भी शक्ति संतुलन को बदल देता है, क्योंकि उन्हें अब पुराने चेहरों के बजाय नए समीकरणों में फिट बैठने वाले जिताऊ उम्मीदवारों की तलाश करनी पड़ती है।
​कुल मिलाकर, परिसिमन राज्य की राजनीति में एक प्रकार की ‘क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन’ यानी रचनात्मक विनाश की प्रक्रिया है। यह पुराने और स्थिर हो चुके राजनीतिक ढांचों को तोड़कर एक नई ऊर्जा और प्रतिस्पर्धा के लिए रास्ता साफ करता है।

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सत्ता की यह नई चाबी किसके हाथ लगेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा दल या नेता इन बदलती सीमाओं के भीतर छिपे नए जनादेश को सबसे पहले और सबसे बेहतर तरीके से समझ पाता है। यह प्रक्रिया लोकतंत्र को जड़ होने से बचाती है और मतदाता के पास भी नए विकल्पों और नई उम्मीदों के साथ जुड़ने का मार्ग प्रशस्त करती है।

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