जशपुर। छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्वी कोने पर बसा जशपुर जिला इन दिनों अपनी एक नई पहचान गढ़ रहा है। कभी सिर्फ धान और पारंपरिक सब्जियों की खेती पर निर्भर रहने वाला यह वनांचल अब नाशपाती लोक के रूप में तब्दील हो चुका है। कम या ज्यादा बारिश के जुए में फंसकर लागत तक न निकाल पाने वाले यहाँ के मेहनतकश किसानों ने अब बागवानी का रुख किया है, जिससे उनकी तकदीर और तस्वीर दोनों बदल रही है। उद्यानिकी विभाग की मदद से शुरू हुई नाशपाती की खेती ने यहाँ के किसानों की आय को दोगुना कर दिया है।

तीन राज्यों का प्रवेश द्वार बना वरदान, बगीचे से ही उठ रही फसल

जशपुर की भौगोलिक स्थिति इसके लिए सबसे बड़ा वरदान साबित हो रही है। झारखंड और ओडिशा की सीमाओं से घिरे होने के कारण इसे इन राज्यों का प्रवेश द्वार कहा जाता है। आज इसी रास्ते से जशपुर की रसीली नाशपाती बड़ी मात्रा में बिकने के लिए ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल तक पहुंच रही है।

किसानों को अब अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों और बाजारों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। पड़ोसी राज्यों से आने वाले थोक व्यापारी सीधे किसानों के बागानों तक पहुंच रहे हैं। वे मौके पर ही पूरी फसल का सौदा करते हैं और नगद भुगतान कर नाशपाती ले जाते हैं। इससे किसानों को न केवल बेहतर दाम मिल रहे हैं, बल्कि उनका परिवहन खर्च और समय भी बच रहा है।

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3500 किसान और 1500 टन का रिकॉर्ड उत्पादन

उद्यानिकी विभाग के सहायक संचालक करन सोनकर के मुताबिक जशपुर जिले की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियां नाशपाती के उत्पादन के लिए सबसे बेहतरीन हैं। वर्तमान में जिले के लगभग 3500 किसान इस खेती से सीधे जुड़ चुके हैं और हर साल करीब 1500 टन नाशपाती का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत किसानों को पौधारोपण, तकनीकी मार्गदर्शन और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। विभाग के आकलन के अनुसार नाशपाती की खेती से किसानों को प्रति एकड़ एक लाख से डेढ़ लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो रहा है, जो पारंपरिक फसलों के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।

दिल्ली के बाजारों तक जशपुर की नाशपाती की धमक

स्थानीय किसानों का कहना है कि जशपुर की नाशपाती अब सिर्फ पड़ोसी राज्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी मांग देश की राजधानी दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल के बड़े बाजारों में भी तेजी से बढ़ी है। अपनी बेहतरीन गुणवत्ता, प्राकृतिक मिठास और लंबे समय तक सुरक्षित रहने की अनूठी क्षमता के कारण बड़े व्यापारी इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं। बीते तीन-चार सालों के मुकाबले इस वर्ष किसानों को अब तक की सबसे बंपर आय प्राप्त हुई है, जिसे देखकर क्षेत्र के दूसरे किसान भी अब पारंपरिक खेती छोड़ इस नकदी फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

फूड प्रोसेसिंग और जैम जेली प्लांट की उठ रही मांग

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विशेषज्ञ समर्थ जैन के अनुसार नाशपाती की इस बढ़ती मांग के पीछे देश का बढ़ता फूड प्रोसेसिंग सेक्टर है। देशभर में जैम, जेली, फ्रूट स्प्रेड, जूस और बेकरी उत्पादों में नाशपाती के गूदे (पल्प) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। बच्चों के बीच नाशपाती से बने जैम और जेली की भारी पसंद को देखते हुए अब जशपुर में ही जैम एंड जेली प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की मांग उठने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जशपुर में ही प्रोसेसिंग यूनिट शुरू हो जाए, तो किसानों को स्थानीय स्तर पर अपनी फसल का और भी बेहतर मूल्य मिल सकेगा।

धान का सबसे मजबूत और मुनाफेदार विकल्प

जशपुर में लगातार बढ़ रहे धान के रकबे को संतुलित करने के लिए प्रशासन और उद्यानिकी विभाग इसे एक बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि जशपुर, मनोरा, सन्ना और बगीचा जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में नाशपाती की खेती धान की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक साबित हो रही है। यदि आने वाले समय में किसानों को आधुनिक सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज और विपणन की और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाएं, तो जशपुर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई मजबूती मिलेगी और यह क्षेत्र देश के बड़े बागवानी हब के रूप में स्थापित हो जाएगा।

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