जशपुर:
जैन धर्म के प्रखर चिंतक और पूज्य मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज ने जशपुर के युवा उद्यमी समर्थ जैन के कार्यों की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए उन्हें आज के युवाओं के लिए एक ‘रोल मॉडल’ करार दिया है।
मुनि श्री ने कहा कि समर्थ जैसे युवाओं से आज की पीढ़ी को प्रेरणा लेनी चाहिए, जो विदेश की चकाचौंध छोड़कर अपनी माटी और ग्रामीण जनता के उद्धार के लिए जीवन समर्पित कर रहे हैं।
“महुआ नशा नहीं, अमृत के समान खाद्य है”
मुनि श्री ने महुआ के संदर्भ में एक बहुत गहरी बात कही। उन्होंने कहा, “महुआ मूलतः एक बहुत ही पौष्टिक खाद्य और औषधीय गुणों से भरपूर फल था, जिसे विडंबना के कारण लोगों ने केवल ‘नशे’ (शराब) का पर्याय बना दिया। समर्थ ने इस भ्रम को तोड़ा है। उन्होंने महुआ का ‘नया वर्जन’ दुनिया के सामने पेश कर यह सिद्ध कर दिया कि यह गाँव के लोगों की किस्मत बदल सकता है।”
समर्थ जैन ने अपनी विदेशी शिक्षा का उपयोग महुआ के उस स्वरूप को निखारने में किया जो स्वास्थ्य के लिए वरदान है। महुआ से अब केवल नशा नहीं, बल्कि कई प्रकार की औषधियाँ और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ तैयार किए जा रहे हैं:
महुआ के औषधीय गुणों से भरपूर
प्राकृतिक इम्यूनिटी बूस्टर है महुआ से बनी चाय, कुकीज़ और लड्डू जो विटामिन और मिनरल्स का खजाना हैं। जो ऊर्जा दायक खाद्य है.यह एनीमिया से लड़ने में सहायकभी है इसके पारंपरिक औषधीय उपयोग को वैज्ञानिक ढंग से पेश किया जा रहा ।
विदेश की पढ़ाई और गाँव की सेवा
मुनि श्री ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि समर्थ विदेश से पढ़ाई कर यहाँ आए और अपना जीवन जशपुर के गाँवों के विकास में लगा दिया। उन्होंने कहा, “युवाओं को समर्थ से सीखना चाहिए कि कैसे अपनी जड़ों की ओर लौटकर समाज का भला किया जाता है। गाँव की जनता का उद्धार ही राष्ट्र की सच्ची सेवा है।”
परिवार के लिए आशीष वचन
महाराज जी के ये शब्द समर्थ जैन के पूरे परिवार के लिए किसी महा-प्रसाद से कम नहीं हैं। पत्नी अंकिता जैन का कहना है कि मुनि श्री ने समर्थ के संघर्ष और विजन को जो पहचान दी है, उसने उनके सेवा भाव को और अधिक दृढ़ कर दिया है। यह न केवल समर्थ की जीत है, बल्कि जशपुर की उस परंपरागत पहचान की भी जीत है जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया गया था।

