नई दिल्ली: भारतीय रेलवे, जिसे देश की जीवनरेखा कहा जाता है, अब अपनी ‘लेट-लतीफी’ की छवि को पीछे छोड़कर एक नई रफ्तार की ओर बढ़ रही है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा लोकसभा में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, रेलवे की समयबद्धता (Punctuality) में पिछले तीन वर्षों में लगातार सुधार हुआ है। जहां वर्ष 2023-24 में ट्रेनों के समय पर चलने का प्रतिशत 73.62 था, वहीं फरवरी 2026 तक यह बढ़कर 77.24% पहुँच गया है।
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भारतीय रेलवे प्रतिदिन लगभग 25,000 रेलगाड़ियों का विशाल नेटवर्क संचालित करता है। इतनी बड़ी संख्या के बावजूद, इंजन या ओवरहेड बिजली उपकरणों (OHE) की खराबी की घटनाएं मात्र 2% तक सीमित रह गई हैं। रेलवे ने अब ‘रोलिंग ब्लॉक’ प्रणाली और ‘डेटा लॉगर’ जैसी तकनीक अपनाई है, जिससे यात्री ट्रेनों के आगमन और प्रस्थान की रियल-टाइम रिपोर्टिंग संभव हो सकी है।
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इंजनों का ‘डिजिटल रिमोट कंट्रोल’
रेलवे ने अपने डीजल इंजनों को अब और भी स्मार्ट बना दिया है। ‘रेमलोट’ (REMMLOT) तकनीक के जरिए अब इंजनों की दूर बैठे ही निगरानी और प्रबंधन किया जा रहा है। संकट के समय तुरंत मदद पहुँचाने के लिए पूरे भारत में ‘क्विक रिस्पांस टीम’ (QRT) तैनात की गई हैं। इसके अलावा, इंजनों में कंप्यूटर नियंत्रित ब्रेक प्रणाली लगाकर उनकी सुरक्षा और भरोसे को और मजबूत किया गया है।
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सुपर-मशीनों से पटरियों की सफाई
ट्रेनों को सुरक्षित और तेज चलाने के लिए पटरियों के नीचे दबी ‘गिट्टी’ (Ballast) की सफाई अब इंसानों के बजाय उन्नत मशीनों द्वारा की जा रही है। रेलवे ने ‘गहन स्क्रीनिंग’ के लिए 65 नई हाई-टेक मशीनें (HOBCM) तैनात की हैं। पहले यह काम पुरानी पद्धति से होता था, लेकिन अब वैज्ञानिक आधार पर जहां जरूरत होती है, वहीं मशीनों से सफाई की जाती है। पिछले पांच वर्षों में पटरियों की सफाई की गति 9,985 किमी से बढ़कर 15,433 किमी प्रति वर्ष तक पहुँच गई है।
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हर मौसम के लिए ओएचई (OHE) कवच
सर्दियों में कोहरा हो या गर्मी में बिजली के तारों का ढीला पड़ना, रेलवे ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए ओएचई प्रणाली को अपग्रेड किया है। पुराने तारों को समय पर बदला जा रहा है और ट्रैक के किनारे उन पेड़ों की पहचान कर छंटाई की जा रही है जिनसे बिजली की लाइनों में खराबी आ सकती है। इन तकनीकी सुधारों का नतीजा है कि अब तकनीकी विफलताएं कम हुई हैं और रेल सफर अधिक सुगम और समयबद्ध हुआ है।

