बसंत की दस्तक के साथ झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के खेतों में कुदरत की एक अनूठी सौगात अंगड़ाई लेती है जिसे दुनिया चिमटी साग के नाम से जानती है। यह सिर्फ एक भाजी नहीं बल्कि मिट्टी की ममता से खुद-ब-खुद फूटने वाला वह सिग्नेचर है जिसे न बोया जाता है और न ही सींचा जाता है।
आज के दौर में जहाँ ऑर्गेनिक के नाम पर बाजारों में दिखावा होता है वहीं गांवों के खेतों में बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक के यह सुपरफूड लहलहा रहा है।
विडंबना यह है कि शहर की चकाचौंध में रहने वाले लोग हाइब्रिड सब्जियों को ही स्वाद समझ बैठे हैं जबकि इस चिमटी की रंगत और इसके औषधीय गुणों के आगे बड़े-बड़े मल्टी-विटामिन फेल हैं।
कैल्शियम और दुर्लभ पोषक तत्वों की खान यह साग हमारी पुरानी पीढ़ियों की सेहत का असली राज रहा है।
सत्तर वर्षीय बुजुर्ग किसान मंगल राम बताते हैं कि उनकी हड्डियों की मजबूती का आधार यही चिमटी साग और मड़ुआ है जिसके सामने शहर की महंगी दवाइयां भी फीकी हैं। व्यावसायिक खेती की दौड़ से दूर यह साग केवल खिलाने के लिए पैदा होता है इसीलिए इसमें वह सोंधापन बरकरार है जो हाइब्रिड खेती में कहीं खो गया है। इसे बनाने की विधि भी उतनी ही सात्विक है जितनी यहाँ के लोगों की जीवनशैली जहाँ लहसुन और सूखी मिर्च का तड़का इसे फाइव-स्टार होटल के जायके से भी बेहतर बना देता है।
चिकित्सीय दृष्टिकोण से डॉ. अनिल कुमार और आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. रश्मि टोप्पो इसे हड्डियों के घनत्व को बढ़ाने वाला और रक्तशोधक मानते हैं। एनीमिया से जूझ रही महिलाओं के लिए यह आयरन का प्राकृतिक वरदान है और इसका कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स इसे शुगर के मरीजों के लिए सर्वोत्तम आहार बनाता है। यह हमारी उस समृद्ध विरासत का प्रतीक है जिसे हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में पीछे छोड़ते जा रहे हैं। समय आ गया है कि हम विदेशी ब्रोकली के बजाय अपनी मिट्टी के इस ‘ग्रीन गोल्ड’ को पहचानें क्योंकि असली सेहत रसायनों वाले बंद डिब्बों में नहीं बल्कि प्रकृति की इस खुली सौगात में छिपी है।

