छत्तीसगढ़
: बदलते दौर में लोग अब सेहत की ओर लौट रहे हैं, यही वजह है कि ट्राइबल क्षेत्रों का ‘देशी मुनगा’ (सहजन) अब केवल गाँव की थाली तक सीमित नहीं रहा। आज बाजारों में हाइब्रिड मुनगा की तुलना में देशी मुनगा के फूलों की डिमांड कई गुना बढ़ गई है। हालत यह है कि शहरों के फाइव-स्टार किचन से लेकर गाँव की झोपड़ी तक, इसके फूलों का बोलबाला है।
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शहर में ‘हेल्थ सूप’ तो गाँव में ‘टेस्टी गुडा’
मुनगा के फूलों को लेकर दो अलग-अलग संस्कृतियों का मिलन देखने को मिल रहा है। जहाँ शहरों में फिटनेस के शौकीन लोग इसके फूलों का ‘डिटॉक्स सूप’ या ‘हर्बल चाय’ बनाकर पी रहे हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों और ट्राइबल क्षेत्रों में इसका पारंपरिक ‘गुडा’ (सुकटी) सबसे लोकप्रिय है। फूलों को सुखाकर तैयार किया गया यह गुडा न केवल स्वाद में बेमिसाल है, बल्कि आदिवासियों के लिए एक अनिवार्य प्राकृतिक औषधि भी है।
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हाइब्रिड पर भारी ‘देशी’ का दबदबा
बाजार में हाइब्रिड सब्जियाँ भले ही सस्ती और चमकदार दिखती हों, लेकिन स्वाद और गुणों के मामले में देशी मुनगा ने बाजी मार ली है।
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शुद्ध देशी मुनगा के फूल बाजार में 400 से 500 रुपये प्रति किलो तक बिक रहे हैं।लोग इसके आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कायल हैं। खासकर एनीमिया (खून की कमी) और ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए इसे ‘सुपरफूड’ माना जा रहा है।
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आदिवासी संस्कृति की पहचान है ‘सुकटी’
क्षेत्र के वरिष्ठ ग्रामीणों का कहना है कि मुनगा का फूल उनके लिए सिर्फ सब्जी नहीं, बल्कि पूर्वजों का दिया हुआ स्वास्थ्य का आशीर्वाद है। फूलों को सुखाकर रखी गई सुकटी का उपयोग दवा के रूप में किया जाता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने में अचूक है।

आयुर्वेद के जानकारों का कहना है कि मुनगा के फूलों की तासीर गर्म होती है। इसलिए इसे दवा या सब्जी के रूप में लेते समय मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है, खासकर गर्मी के मौसम में या एसिडिटी के मरीजों के लिए।
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“गाँव का देशी मुनगा आज अपनी शुद्धता के कारण बड़े शहरों के बाजारों की शान बन गया है। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि आदिवासियों की वह पारंपरिक दवा है जिसे अब दुनिया पहचान रही है।”

