विशेष रिपोर्ट | उदालक नायडू /राकेश सिँह जशपुर
छत्तीसगढ़ के वनों की सदियों पुरानी पहचान ‘महुआ’ अब एक क्रांतिकारी बदलाव के दौर से गुजर रहा है।
चुनौतियों के पाले में तपकर निखरा जशपुर का ‘लाल हीरा’, अब ग्लोबल मार्केट पर नजर
कल तक जिस महुआ का नाम आते ही जेहन में केवल शराब की भट्ठियों और पारंपरिक ‘पैमानों’ की छवि उभरती थी, आज वही महुआ अपनी पुरानी पहचान को पीछे छोड़ आधुनिक रसोई के डाइनिंग टेबल तक पहुँच चुका है। जशपुर और बस्तर के घने जंगलों से निकलकर यह बहुमूल्य वनोपज अब ‘महुआ नेक्टर’ के एक नए और आधुनिक अवतार में पेश किया गया है, जो ‘नशा’ नहीं बल्कि ‘सेहत की मिठास’ घोलने का काम कर रहा है।
परंपरा से आधुनिकता का सफर
पारंपरिक रूप से महुआ के फूलों को किण्वन (Fermentation) की प्रक्रिया से गुजारकर केवल शराब बनाई जाती थी, जिससे इसकी पहचान एक सीमित और नकारात्मक दायरे में सिमट गई थी। हालांकि, ‘महुआ नेक्टर’ की इस नई पहल ने इसे उस पुराने अक्स से पूरी तरह आजाद कर दिया है। यह उत्पाद कोई नशीला पदार्थ नहीं, बल्कि 100 प्रतिशत शुद्ध महुआ के फूलों का अर्क है। इस नवाचार ने महुआ को शराब की बोतलों की कैद से बाहर निकालकर एक ‘सुपरफूड’ के रूप में स्थापित कर दिया है।

शुद्धता और सेहत का बेमिसाल संगम
इस उत्पाद की सबसे बड़ी खासियत इसकी अद्वितीय और प्राकृतिक शुद्धता है। इसे तैयार करने की प्रक्रिया में न तो चीनी का उपयोग किया गया है और न ही गुड़ का; यहाँ तक कि इसमें किसी भी प्रकार के बाहरी प्रिजर्वेटिव या मिलावट को जगह नहीं दी गई है। यह पूरी तरह से गैर-अल्कोहलिक (Non-alcoholic) है, जिसका अर्थ है कि इसमें रत्ती भर भी नशा नहीं है। यही कारण है कि यह बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग के व्यक्ति के लिए पूरी तरह सुरक्षित और एक बेहतरीन ‘हेल्थ सप्लीमेंट’ बन गया है।

रसोई का नया और स्वास्थ्यवर्धक साथी
जहाँ पहले महुआ का स्वाद लेने के लिए लोग ठेकों के मोहताज होते थे, वहीं अब इस ‘रीइमेजिन’ किए गए फॉरेस्ट फूड का उपयोग हेल्थ-कॉन्शियस घरों में एक नेचुरल स्वीटनर के रूप में हो रहा है। इसके उपयोग का तरीका भी बेहद सरल और आधुनिक है। आप इसे अपनी सुबह की चाय, गर्म दूध या सादे पानी में केवल आधा चम्मच मिलाकर सेवन कर सकते हैं। यह न केवल आपके पेय पदार्थों में प्राकृतिक मिठास घोलता है, बल्कि महुआ के उन औषधीय गुणों को भी शरीर तक पहुँचाता है जो प्राकृतिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।

सामाजिक बदलाव और वैश्विक पहचान
‘पैमाने से निकलकर कप तक’ का यह सफर सिर्फ एक उत्पाद का बदलाव नहीं है, बल्कि यह उन जनजातीय समुदायों के सम्मान और मेहनत की नई कहानी है जो पीढ़ियों से इन फूलों को सहेजते आ रहे हैं। यह नवाचार न केवल महुआ को देखने का सामाजिक नजरिया बदल रहा है, बल्कि इसे ग्लोबल मार्केट में चीनी के एक स्वस्थ विकल्प के रूप में भी खड़ा कर रहा है। बिना किसी केमिकल के तैयार यह ‘जंगल का सोना’ अब अपनी बदनामी के घेरे को तोड़कर दुनिया के सामने एक गौरवशाली पहचान बना रहा है।


