नई दिल्ली।
देश में नवजात और छोटे बच्चों के स्वास्थ्य और विकास को लेकर केंद्र सरकार ने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब बच्चों की देखभाल केवल समय पर टीका लगाने (टीकाकरण) तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जन्म से लेकर तीन साल (36 महीने) की उम्र तक सरकार हर बच्चे की सेहत और शारीरिक-मानसिक विकास की नियमित निगरानी करेगी। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने सोमवार को ‘समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम’ की शुरुआत करते हुए इसके तहत नई और विस्तृत गाइडलाइन जारी की है। इस नए कार्यक्रम के तहत यदि कोई बच्चा कम वजन का है, समय से पहले (प्री-मैच्योर) पैदा हुआ है या उसके विकास में कोई देरी दिखती है, तो उसे तुरंत ‘उच्च जोखिम श्रेणी’ (High-Risk Category) में रखकर विशेष चिकित्सा और देखभाल दी जाएगी।
एसएनसीयू (SNCU) से डिस्चार्ज बच्चे भी उच्च जोखिम श्रेणी में शामिल
नए दिशानिर्देशों के अनुसार, जिन नवजात शिशुओं को जन्म के बाद किसी समस्या के कारण ‘स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट’ (SNCU) में भर्ती करना पड़ा था, उन्हें अनिवार्य रूप से उच्च जोखिम श्रेणी में माना जाएगा। ऐसे बच्चों की सेहत की बार-बार सघन जांच की जाएगी और जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टरों (Pediatricians) के पास रेफर किया जाएगा। सरकार ने डिजिटल मॉनिटरिंग को मजबूत करते हुए स्पष्ट किया है कि हर नवजात शिशु की पूरी जानकारी ‘जननी पोर्टल’ और ‘शैशव ऐप’ में अनिवार्य रूप से दर्ज की जाएगी। इसके जरिए जोखिम वाले बच्चों को डिजिटल रूप से चिह्नित (Tag) किया जाएगा, ताकि एएनएम, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, डॉक्टर और आशा कार्यकर्ता मिलकर उनकी हर गतिविधि और सेहत पर लगातार पैनी नजर रख सकें।
घर-घर जाकर सलाह देंगी आशा कार्यकर्ता, माता-पिता को स्क्रीन से दूर रहने की हिदायत
इस अभियान को धरातल पर उतारने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है। आशा कार्यकर्ता नियमित रूप से परिवारों के घर जाकर माताओं को स्वास्थ्य संबंधी जरूरी सलाह देंगी, जिसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
-
जन्म के बाद शिशु को केवल मां का दूध (स्तनपान) पिलाने की अनिवार्यता समझाना।
-
बच्चे की त्वचा से त्वचा का संपर्क यानी ‘कंगारू मदर केयर’ (Kangaroo Mother Care) के फायदों के बारे में बताना।
-
बच्चे के मानसिक व भावनात्मक विकास के लिए उससे बात करने, खेलने और सुरक्षित घरेलू वातावरण बनाए रखने के लिए प्रेरित करना।
-
छह सप्ताह (डेढ़ महीने) की उम्र पूरी होने के बाद बच्चे को उम्र के अनुसार सही पोषण, खेलकूद और मानसिक गतिविधियों से जोड़ना।
इसके साथ ही, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने माता-पिता को एक बेहद महत्वपूर्ण सलाह देते हुए कहा है कि तीन साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन, टैबलेट, टीवी या किसी भी अन्य स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखें। इसके बजाय बच्चों को कहानी सुनाने, उनसे आमने-सामने बातचीत करने और शारीरिक खेलकूद के लिए प्रेरित करें।
पहचानें नवजात बच्चों के ये ‘डेंजर साइन’, तुरंत ले जाएं अस्पताल
नई गाइडलाइन में बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े कई गंभीर आपातकालीन लक्षण (Danger Signs) बताए गए हैं। यदि किसी बच्चे में ये लक्षण दिखाई दें, तो उसे बिना देरी किए तुरंत अस्पताल ले जाना होगा:
-
बच्चे का दूध न पीना या स्तनपान करने में असमर्थ होना।
-
सांस लेने में गंभीर तकलीफ होना या सीने का नीचे की तरफ ज्यादा धंसना।
-
बच्चे को बार-बार दौरे पड़ना, तेज बुखार होना या शरीर में लगातार सुस्ती या बेहोशी छाना।
-
बच्चे को लगातार दस्त होना या मल (Stool) में खून आना।
पहली बार जलवायु परिवर्तन और तेज गर्मी से बचाव को नीति में किया गया शामिल
इस स्वास्थ्य नीति में पहली बार जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ते तापमान के खतरों को बच्चों के स्वास्थ्य से जोड़ा गया है। आशा कार्यकर्ता अब ग्रामीण और शहरी परिवारों को तेज गर्मी, लू और वायु प्रदूषण से बच्चों को बचाने के व्यावहारिक उपाय सिखाएंगी। गाइडलाइन में कहा गया है कि दोपहर की तेज धूप में छोटे बच्चों को भूलकर भी बाहर न ले जाएं, उन्हें हमेशा हल्के व ढीले सूती कपड़े पहनाएं, नवजात शिशुओं को हाइड्रेटेड रखने के लिए बार-बार स्तनपान कराएं और उन्हें हर हाल में प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से बचाएं।


