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नई दिल्ली, 01 अप्रैल 2026 — जनजातीय क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़े रखने और स्कूलों में ‘ड्रॉपआउट’ (पढ़ाई बीच में छोड़ना) की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बेहद संवेदनशील कदम उठाया है। केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके ने राज्यसभा में इस नई रणनीति का खुलासा करते हुए बताया कि ‘एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों’ (EMRS) में अब ‘होम-आधारित अभिभावक-शिक्षक बैठक’ (PTM) की शुरुआत की गई है। इस पहल का उद्देश्य स्कूल, परिवार और समुदाय के बीच के फासले को कम करना है।

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अक्सर देखा गया है कि दूरदराज के आदिवासी इलाकों में भाषाई बाधा, सांस्कृतिक हिचक या संवाद की कमी के कारण माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने में संकोच करते हैं या बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए अब राष्ट्रीय जनजातीय छात्र शिक्षा समिति (NESTS) ने शिक्षकों को सीधे छात्रों के घर भेजने का निर्णय लिया है। योजना के अनुसार, प्रत्येक शिक्षक के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह एक शैक्षणिक वर्ष के दौरान कम से कम एक बार अपने प्रत्येक छात्र के घर जाकर उसके अभिभावकों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करे।

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यह मुलाकातें महज एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होंगी, बल्कि इनमें छात्र के सर्वांगीण विकास पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। शिक्षक और अभिभावक मिलकर छात्र की शैक्षणिक प्रगति, उसके व्यवहार, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य तथा स्कूल में उसके अनुभव साझा करेंगे। छुट्टियों या विशेष आउटरीच अवधियों के दौरान होने वाली इन मुलाकातों से अभिभावकों के मन में स्कूल के प्रति विश्वास बढ़ेगा और वे अपने बच्चों की शिक्षा में एक सक्रिय भागीदार की भूमिका निभा सकेंगे।

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सरकार ने इस पहल में सांस्कृतिक संवेदनशीलता का भी विशेष ध्यान रखा है। शिक्षकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे जनजातीय समुदायों के घर जाते समय वहां के रीति-रिवाजों, परंपराओं और स्थानीय संस्कृति का पूरा सम्मान करें। एक पेशेवर गरिमा के साथ जब शिक्षक छात्र के परिवेश में कदम रखेंगे, तो इससे छात्र के मन में भी अपने गुरु और विद्यालय के प्रति अपनापन विकसित होगा। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी स्कूल के प्रधानाचार्यों द्वारा की जाएगी, जो सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करेंगे।

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विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित न रहकर छात्र के घर के आंगन तक पहुँचती है, तो वह एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लेती है। ‘होम-विजिट’ की यह अनूठी पहल न केवल ईएमआरएस में छात्रों की उपस्थिति में सुधार लाएगी, बल्कि आदिवासी समुदायों में शिक्षा के प्रति एक नई अलख जगाएगी, जिससे आने वाले वर्षों में पढ़ाई छोड़ने की दर में भारी गिरावट आने की उम्मीद है।

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