वैज्ञानिक नवाचार की नई इबारत लिखती ‘इंस्पायर’ योजना: छत्तीसगढ़ के बाल वैज्ञानिकों ने भी गाड़े सफलता के झंडे

पुणे, 1 अप्रैल 2026 — क्या आपने कभी सोचा है कि जिस अंगूर को आप बिना बीज के बड़े चाव से खाते हैं, वह आखिर बिना ‘बच्चे’ (बीज) पैदा किए फल कैसे बन जाता है? कुदरत के इस अनोखे करिश्मे के पीछे छिपे ‘जेनेटिक कोड’ को अब भारतीय वैज्ञानिकों ने डिकोड कर लिया है। पुणे के आगरकर अनुसंधान संस्थान (ARI) के वैज्ञानिकों ने वह राज खोल दिया है, जिसने अंगूरों को दुनिया का सबसे लाडला फल बना दिया है।

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शादी (निषेचन) के बिना ही ‘बेबी’ (फल) तैयार!

वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘पार्थेनोकार्पी’ कहते हैं, लेकिन आम भाषा में समझें तो यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ अंगूर की बेल में ‘शादी’ यानी निषेचन की प्रक्रिया पूरी ही नहीं होती, फिर भी रसीला फल तैयार हो जाता है। डॉ. रविंद्र पाटिल और उनकी टीम ने अपनी लैब में जब अंगूर की मशहूर किस्म ‘ARI-516’ का माइक्रोस्कोप के नीचे मुआयना किया, तो उन्हें एक हैरान करने वाली बात पता चली।

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कमजोर ‘पराग’ ने पलटा पासा

जांच में सामने आया कि बीज-रहित अंगूरों के परागकण (Pollen grains) असल में ‘बांझ’ होते हैं। उनकी शक्ल-सूरत बिगड़ी हुई होती है और उनमें इतनी जान ही नहीं होती कि वे अंकुरित हो सकें। इतना ही नहीं, इन पौधों में मादा प्रजनन हिस्सा भी सामान्य अंगूरों के मुकाबले काफी छोटा होता है। नतीजा यह होता है कि निषेचन की प्रक्रिया बीच में ही दम तोड़ देती है और बीज बनने की नौबत ही नहीं आती। लेकिन कुदरत का कमाल देखिए—बिना बीज के भी यह फल अपनी पूरी मिठास और बनावट के साथ विकसित हो जाता है।

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वैज्ञानिकों ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए अंगूरों का ‘होल-जीनोम सीक्वेंसिंग’ (DNA की पूरी कुंडली) खंगाली। उन्हें पता चला कि कुछ खास जींस में ‘म्यूटेशन’ यानी आनुवंशिक बदलाव हुए हैं। ये वही जींस हैं जो सेल डिवीजन और हार्मोन सिग्नलिंग का काम संभालते हैं। इन जींस की सुस्ती की वजह से ही बीज बनने का रास्ता बंद हो जाता है।

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अब आपकी प्लेट में होंगे और भी मीठे अंगूर

यह खोज सिर्फ किताबी नहीं है। अब जब वैज्ञानिकों को यह पता चल गया है कि ‘बीज-रहित’ होने का स्विच कहाँ है, तो वे भविष्य में ऐसी नई किस्में तैयार कर सकेंगे जो आज के मुकाबले ज्यादा मीठी, पतली त्वचा वाली और हर मौसम को झेलने वाली होंगी। किशमिश और जूस इंडस्ट्री के लिए तो यह खोज किसी जैकपॉट से कम नहीं है। पुणे के वैज्ञानिकों की इस कामयाबी ने साबित कर दिया है कि भारत अब खेती की दुनिया में केवल पसीना ही नहीं बहा रहा, बल्कि लैब में बैठकर भविष्य की खेती की रूपरेखा भी लिख रहा है।

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