अंबिकापुर | दशकों का इंतजार, अनगिनत जन-आंदोलन और विकास की अधूरी हसरत अब हकीकत में बदलने की दहलीज पर खड़ी है। सरगुजा अंचल को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क की मुख्यधारा से जोड़ने की वर्षों पुरानी माँग ने उस वक्त एक नई और जोरदार रफ्तार पकड़ ली, जब सांसद चिंतामणि महाराज ने केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के समक्ष अम्बिकापुर-बरवाडीह और अम्बिकापुर-रेणुकूट रेल मार्ग का मास्टरप्लान पेश किया।

यह केवल पटरियों को बिछाने का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि सरगुजा को पूर्वी मध्य भारत के एक रणनीतिक रेल जंक्शन के रूप में स्थापित करने की एक दूरगामी और ऐतिहासिक पहल है, जो आने वाले समय में क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक दिशा को पूरी तरह बदल कर रख देगी।
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इस रेल परियोजना का सबसे रोमांचक और स्वर्णिम पक्ष वह संभावित कॉरिडोर है जो झारसुगुड़ा से अंबिकापुर होते हुए सीधे प्रयागराज और अयोध्या तक की दूरी को समेट लेगा। कल्पना कीजिए उस स्वर्ण मार्ग की, जो ओडिशा के औद्योगिक बेल्ट और पूर्वी बंदरगाहों को सीधे उत्तर भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों से जोड़ देगा।

यदि यह धुरी साकार होती है, तो अंबिकापुर केवल एक स्टेशन बनकर नहीं रह जाएगा, बल्कि यह पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाले एक विशाल रेल कॉरिडोर का हृदय स्थल बन जाएगा। इससे न केवल माल परिवहन की लागत में भारी कमी आएगी, बल्कि अयोध्या के नवनिर्मित अंतरराष्ट्रीय धार्मिक केंद्र और प्रयागराज के शैक्षणिक व स्वास्थ्य संस्थानों तक उत्तरी छत्तीसगढ़ के लोगों की पहुँच बेहद सुगम और सस्ती हो जाएगी।
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तकनीकी और प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो अम्बिकापुर-बरवाडीह रेल लाइन की लगभग 262 किलोमीटर लंबी परियोजना अब फाइलों से निकलकर धरातल पर आने को बेताब है, क्योंकि इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार है और रेल मंत्रालय से औपचारिक सहमति के संकेत भी मिल चुके हैं। इसी तरह, रेणुकूट मार्ग की उपयोगिता ने भी विशेषज्ञों को अपनी ओर आकर्षित किया है, क्योंकि इसे कम लागत में अधिक मुनाफे वाला मार्ग माना जा रहा है।
हालांकि शुरुआती सर्वेक्षणों में कुछ अड़चनें आईं थीं, लेकिन नवीनतम रिपोर्ट्स ने यह साबित कर दिया है कि इन रेल मार्गों पर यात्रियों और माल ढुलाई का इतना भारी दबाव रहने वाला है कि यह रेलवे के लिए एक लाभकारी निवेश साबित होगा।
जब यह पटरियां सरगुजा की माटी को छुएंगी, तो विकास का एक नया सूर्योदय होगा। कृषि से लेकर वनोपज तक और खनिज से लेकर पर्यटन तक, हर क्षेत्र में अवसरों की बाढ़ आ जाएगी।
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सरगुजा के किसान अपनी फसलों को बड़े बाजारों तक भेज सकेंगे, तो वहीं मेनपाट जैसे ‘छत्तीसगढ़ के शिमला’ में पर्यटकों की आवक बढ़ने से स्थानीय होटल और पर्यटन उद्योग में अभूतपूर्व उछाल आएगा। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव स्वास्थ्य सेवाओं में दिखेगा, जहाँ गंभीर मरीजों को रायपुर, वाराणसी या प्रयागराज ले जाने में लगने वाला कीमती समय अब रेल के सफर से बच सकेगा। अब सारा दारोमदार रेल मंत्रालय से मिलने वाली अंतिम प्रशासनिक स्वीकृति और बजट आवंटन पर टिका है, जिसे लेकर पूरे सरगुजा अंचल में उम्मीदों का ज्वार उफान पर है।
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