छत्तीसगढ़ के थोक और रिटेल बाजारों में मसालों और खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों की रसोई का पूरा गणित बिगाड़ कर रख दिया है। बाजार के जानकारों और व्यापारियों के अनुसार इस तीखी महंगाई के पीछे का सबसे बड़ा कारण मंडियों से माल की कम आवक होना, परिवहन लागत में बढ़ोतरी और इस बार सरसों की पैदावार कम होने से कच्चे माल की भारी कमी होना है। आपूर्ति में आई इस बड़ी कमी के कारण रायपुर के सदर बाजार सहित प्रदेश की तमाम बड़ी मंडियों और छोटी किराना दुकानों से रौनक गायब है।
कीमतों में आए इस उछाल की बात करें तो पहले एक सौ सत्तर रुपये प्रति किलो बिकने वाला सरसों तेल अब एक सौ नब्बे रुपये तक पहुंच गया है जबकि ब्रांडेड पैकिंग वाले तेल के दामों में भी लगभग तीस रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसी तरह दो सौ चालीस रुपये मिलने वाली पाउडर मिर्ची अब दो सौ अस्सी रुपये, एक सौ साठ रुपये वाली पिसी धनिया अब दो सौ रुपये और दो सौ अस्सी रुपये मिलने वाली साबूत लाल मिर्ची अब तीन सौ बीस रुपये प्रति किलो के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
महंगाई की इस चौतरफा मार ने छत्तीसगढ़ के उपभोक्ताओं और विशेषकर मध्यमवर्गीय परिवारों के खरीदारी के व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है। किराना व्यापारी शिवम कुमार और स्थानीय व्यापारी अंकित व सुरेंद्र का कहना है कि जो ग्राहक पहले महीने की शुरुआत में ही बेफिक्र होकर एक किलो या उससे अधिक मसाले एक साथ तौलवाते थे, वे अब आधा किलो, पाव या सिर्फ हफ्ते भर की जरूरत के हिसाब से बहुत ही नाप-तोल कर खरीदारी कर रहे हैं जिससे दुकानदारों का टर्नओवर भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
प्रदेश की गृहिणियों पूनम, संगीता और सरिता जायसवाल का कहना है कि खाद्य पदार्थों और महंगे मेवों की इस महंगाई ने मासिक बजट को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है जिसके कारण अब राशन की लिस्ट छोटी करनी पड़ रही है और फालतू खर्चों से पूरी तरह परहेज करना पड़ रहा है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जब तक प्रमुख मंडियों से माल की आपूर्ति सामान्य नहीं होती और मालभाड़े में कमी नहीं आती, तब तक आम आदमी को रसोई के स्वाद के लिए अपनी जेब इसी तरह ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी।

