एक छोर पर राजसी रथ, दूसरे छोर पर सुलगती लंका पर पत्थरों का प्रहार: जशपुर का वह ऐतिहासिक दशहरा, जहाँ इतिहास खुद को दोहराता है
जशपुरनगर: असत्य पर सत्य की विजय और धर्म की स्थापना का प्रतीक विजयादशमी का पर्व जशपुर में मंगलवार को पारंपरिक उत्साह, भक्ति और राजसी वैभव के साथ मनाया गया। भगवान बालाजी की भव्य शाही रथयात्रा, लंका दहन, रावण वध और अपराजिता पूजा के साथ जशपुर के ऐतिहासिक रियासतकालीन दशहरा महोत्सव का रंगारंग समापन हुआ। इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के साक्षी बनने के लिए शहर सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु रणजीता स्टेडियम में जुटे।
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सोलह श्रृंगार के साथ निकली भगवान बालाजी की शाही रथयात्रा
विजयादशमी के अवसर पर बालाजी मंदिर में विशेष अनुष्ठान किए गए। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान बालाजी का सोलह श्रृंगार कर उन्हें चांदी के सिंहासन पर विराजमान किया गया। इसके बाद राज परिवार के सदस्यों ने पूजा-अर्चना कर भगवान को लकड़ी के विशेष रथ पर आरूढ़ कराया।
शाम करीब चार बजे बालाजी मंदिर से शाही रथयात्रा आरंभ हुई। इस पूरी शोभायात्रा में रियासतकालीन परंपरा की अद्भुत झलक देखने को मिली:
राजसी ठाट-बाठ: शाही परिधानों में सजे सैनिक अस्त्र-शस्त्र, तुरही, चंवर और छत्र के साथ भगवान की सेवा में मुस्तैद नजर आए।
पारंपरिक वाद्ययंत्र: डोम वंशजों के गूंजते ढोल-नगाड़ों और रणभेरी की गगनभेदी ध्वनि के बीच पूरा शहर ‘जय श्रीराम’ और भगवान बालाजी के जयकारों से गूंज उठा।
रथ खींचने की होड़: बालाजी मंदिर से शुरू होकर जय स्तंभ चौक और सिटी कोतवाली होते हुए रणजीता स्टेडियम तक करीब एक किलोमीटर लंबे मार्ग पर रथ खींचने के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह और होड़ देखने को मिली। लोग पवित्र रस्सी को थामकर रथ खींचना अपना सौभाग्य मान रहे थे।
रथयात्रा में राज परिवार के सदस्यों के साथ-साथ आचार्य, पुस्तकाचार्य और राजपुरोहित भी अपने-अपने रथों पर सवार होकर शामिल हुए।
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रणजीता स्टेडियम में लंका दहन और रावण वध
रथयात्रा के रणजीता स्टेडियम पहुंचने पर श्रद्धालुओं ने भगवान बालाजी के दर्शन किए। इसके पश्चात मैदान में पारंपरिक लंका विजय और रावण दहन की रस्म पूरी की गई:
भगवान हनुमान का रूप धारण किए एक व्यक्ति ने भगवान बालाजी से लंका विजय की अनुमति ली और लंका दहन की परंपरा का निर्वहन करते हुए वापस लौटकर रावण का एक सिर भगवान बालाजी के चरणों में अर्पित किया।
लंका विजय की सूचना मिलते ही जयकारों के बीच रावण और लंका के विशाल पुतले का दहन किया गया। असत्य पर सत्य की इस जीत के रोमांचक दृश्य को देखने के लिए पूरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था।
अपराजिता पूजा और नीलकंठ दर्शन के साथ समापन
रावण वध के उपरांत जशपुर के रियासतकालीन दशहरा की प्रमुख परंपराओं का निर्वहन किया गया:
- अपराजिता पूजा: राजपुरोहितों के दल ने रणजीता स्टेडियम के निचले हिस्से में बने विशेष मंडप में वैदिक विधि-विधान से अपराजिता पूजा संपन्न कराई, जो इस उत्सव का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है।
- महाआरती और नीलकंठ दर्शन: भगवान बालाजी की भव्य महाआरती के बाद श्रद्धालुओं को शुभता के प्रतीक ‘नीलकंठ’ पक्षी के दर्शन कराए गए। परंपरा के अनुसार रथ के ऊपर से नीलकंठ को उड़ाया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विजयादशमी के दिन नीलकंठ (जिसे भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है) के दर्शन अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों, परंपराओं और हर्षोल्लास के साथ नौ दिनों तक चलने वाला यह ऐतिहासिक दशहरा महोत्सव शांतिपूर्ण और भव्य तरीके से संपन्न हुआ।


