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ढेंकानाल (ओडिशा)।

आमतौर पर किसी गांव के बच्चे का सपना होता है कि वह बड़ा होकर किसी चमचमाते शहर में जाए, ऊंची डिग्री हासिल करे और अपने पैरों पर खड़ा हो। शहरों की ओर भागती इस दौड़ में सपने तो पूरे हो जाते हैं, लेकिन पीछे छूट जाता है उस गांव का सदियों पुराना इतिहास, भूगोल और परंपराओं का समृद्ध ज्ञान। इस आधुनिक अंधी दौड़ के बीच ओडिशा के ढेंकानाल जिले के कंकड़हाड ब्लॉक से एक ऐसी सुखद और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जो देश के सामने पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की एक अनोखी मिसाल पेश कर रही है। यहां के वनांचल में बच्चों के लिए न तो कोई ब्लैकबोर्ड है और न ही कंक्रीट की चारदीवारी; यहां की क्लास सीधे घने जंगलों में लगती है और इस पाठशाला का नाम है—’विज्डम वॉक’।

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जब पलायन की वजह से लुप्त होने लगा पुरखों का पारंपरिक ज्ञान

दानापासी, हडगारी, कंटोल और बालीकुमा—ये ढेंकानाल जिले के वो चार गांव हैं जो चारों तरफ से ऊंचे पहाड़ों और बेहद घने जंगलों से घिरे हुए हैं। इन वनों में औषधियों और वनस्पतियों का ऐसा खजाना है जिसे समझने में आधुनिक विज्ञान को भी बरसों लग जाएं। बालीकुमा गांव से शुरू हुई इस अनूठी मुहिम की वजह दरअसल एक बड़ी चिंता थी। बीते दो दशकों में रोजगार, औद्योगिक मजदूरी और निर्माण कार्यों के सिलसिले में यहां के युवाओं का शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ा। युवाओं का ध्यान जंगलों से हटा तो प्रकृति से जुड़ा उनका पारंपरिक ज्ञान भी अगली पीढ़ी तक पहुंचना बंद हो गया। बुजुर्गों को डर सताने लगा कि अगर यही हाल रहा, तो सदियों पुरानी यह विरासत हमेशा के लिए दफन हो जाएगी। इसी संकट से निपटने के लिए गांव के बुजुर्गों ने बच्चों को छोटी उम्र से ही जंगल की अहमियत समझाने का बीड़ा उठाया।

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जानिए कौन हैं ये ‘जंगल मास्टर’ और कैसे शुरू हुआ सफर

इस अनोखी पाठशाला को चलाने वाले शिक्षक कोई डिग्रीधारी प्रोफेसर नहीं, बल्कि गांव के वो आदिवासी बुजुर्ग हैं जो अपनी जिंदगी की पारी खेलकर अब रिटायर हो चुके हैं। इन्हीं बुजुर्गों को यहां आदर से ‘जंगल मास्टर’ कहा जाता है। हर सप्ताहांत (वीकेंड) पर ये जंगल मास्टर बच्चों की उंगली थामकर उन्हें प्रकृति के लाइव अध्ययन के लिए घने जंगलों के बीच ले जाते हैं।

करीब सात साल पहले इस मुहिम ने एक औपचारिक रूप लिया। शुरुआत में ग्रामीणों ने आपस में मिलकर सिर्फ गांवों के भीतर ही पदयात्राएं शुरू की थीं। धीरे-धीरे ये कदम जंगलों की ओर बढ़ने लगे और इसे नाम मिला ‘विज्डम वॉक’। आज आलम यह है कि बच्चे हर वीकेंड पर स्कूल बैग और किताबों के बोझ से दूर, इस सैर पर जाने के लिए बेहद उत्साहित रहते हैं।

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सिरदर्द की दवा से लेकर बारिश के लाइव सिग्नल तक, जंगल में मिलता है हर पाठ

जंगल की इस सैर के दौरान ये बुजुर्ग बच्चों को लाइफ स्किल्स और रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाले अद्भुत नुस्खे सिखाते हैं। बच्चे इन जंगल मास्टर्स से सीखते हैं कि कैसे ‘इंद्रजाल’ और ‘महाकालरे’ जैसी वनस्पतियों से सिरदर्द को पल भर में दूर किया जा सकता है, या कैसे ‘महासिंदु’ नाम की जड़ी-बूटी शरीर के हर प्रकार के दर्द में रामबाण का काम करती है। सिर्फ 10 साल के इंद्रमणि दास जैसे बच्चे आज गर्व से बताते हैं कि उन्होंने ‘जयसंदा’ के पौधे से त्वचा के चकत्ते और चोटों को ठीक करना सीख लिया है, जबकि सोहम दास जैसे बच्चे ‘अर्जुन’ के पेड़ की छाल से मधुमेह, पेट और हृदय रोगों के इलाज का पारंपरिक तरीका जानते हैं।

इतना ही नहीं, ये बच्चे मौसम विभाग से पहले ही बारिश का सटीक अंदाजा लगा लेते हैं। उन्हें सिखाया गया है कि अगर दीमक पेड़ों से नीचे उतरने लगे या सूखे मौसम में अर्जुन के पेड़ की पत्तियों से पानी की बूंदें टपकने लगें, तो समझ लीजिए कि बहुत जल्द झमाझम बारिश होने वाली है।

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नारियल पानी जैसा पौष्टिक रस देने वाली लताएं और मजेदार खेल

इस विज़डम वॉक की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बच्चों को जंगलों में जीवित रहने (Survival Skills) के गुर भी सिखाए जाते हैं। सोहम दास बताते हैं कि जंगल मास्टर बच्चों को उन खास पेड़ों की पहचान कराते हैं जो प्यास बुझा सकते हैं। जैसे, ‘पलाश’ के पेड़ की छाल पर अंग्रेजी के ‘V’ आकार का कट लगाकर उसका रस निकाला जाता है। वहीं, ‘अटांडी’ लता के सबसे मोटे तने पर सीधा कट लगाने से जो पानी निकलता है, वह स्वाद और पौष्टिकता में बिल्कुल नारियल पानी जैसा होता है। इसके अलावा खजूर, बांस और सियाली झाड़ी से पानी इकट्ठा करने की कला भी खेल-खेल में सिखाई जाती है।

गांव के ही दयाशंकर बहेरा बताते हैं कि हर सैर बच्चों के लिए एक नया रोमांच लेकर आती है। बुजुर्ग बच्चों के साथ पत्तियों को ढूंढने और उनकी मालाएं पिरोने जैसे छोटे-छोटे खेल खेलते हैं, जिससे बच्चों का जुड़ाव प्रकृति से और गहरा हो जाता है।

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लौट रही है वनों में रुचि, आंगन में उगने लगे पेड़

जंगल मास्टर्स का यह भगीरथ प्रयास अब रंग लाता दिख रहा है। जो बच्चे कभी जंगलों से अनजान थे, उनमें से कई अब खुद ही पेड़-पौधों की सुरक्षा के प्रति सजग हो गए हैं। कई बच्चों ने तो इस वॉक से प्रभावित होकर अपने घरों के आंगन में पारंपरिक पेड़ और औषधियां उगाना भी शुरू कर दिया है। ढेंकानाल के इन गांवों ने साबित कर दिया है कि वनों और वन्यजीवों का संरक्षण केवल कागजी कानूनों से नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी की रगों में प्रकृति के प्रति प्रेम और ज्ञान का संचार करके ही किया जा सकता है।

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