नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा नियमों के कड़ाई से क्रियान्वयन को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई पूरी करते हुए मामले का निपटारा कर दिया है। इस याचिका में वाहनों में अनिवार्य सीट बेल्ट, बच्चों के लिए ‘चाइल्ड रेस्ट्रेंट सिस्टम’ और फर्स्ट-एड किट जैसी जीवनरक्षक व्यवस्थाओं को जमीन पर सख्ती से लागू करने की मांग की गई थी।
मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि देश में सड़क सुरक्षा से जुड़े कानूनों की कोई कमी नहीं है, असल चुनौती उनके प्रभावी प्रवर्तन (Enforcement) और जमीनी स्तर पर यातायात अनुशासन की है।
पीठ ने कहा कि वाहन संचालन के दौरान सीट बेल्ट पहनने समेत सुरक्षा से जुड़े कई उपायों के अनिवार्य पालन के लिए मौजूदा कानूनों में पहले से ही सख्त प्रावधान दर्ज हैं।यात्रियों द्वारा नियमों की अनदेखी करना या कानून लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा चालान व सख्त कार्रवाई न करना मूल रूप से कानून-व्यवस्था और जमीनी ट्रैफिक अनुशासन से जुड़ा मुद्दा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन प्रावधानों का कानून में पहले से उल्लेख है, उन्हें बार-बार न्यायिक आदेशों के जरिए दोहराने से उनके वास्तविक क्रियान्वयन में कोई मदद नहीं मिलेगी।
PIL में क्या मुद्दे उठाए गए थे?
याचिकाकर्ता डॉ. ज्योथिदेव केसवदेव (प्रख्यात मधुमेह विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता) ने याचिका में कई गंभीर बिंदु रखे थे:
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सीट बेल्ट सॉकेट से छेड़छाड़: वाहनों में सीट कवर लगाने या आंतरिक बदलाव के चलते कई बार सीट बेल्ट के रिसेप्टेकल (सॉकेट) ढक जाते हैं या काम नहीं करते।
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चाइल्ड सेफ्टी की उपेक्षा: मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 194B और केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 138(3) का हवाला देते हुए बच्चों के लिए सुरक्षा प्रणाली और सभी यात्रियों के लिए सीट बेल्ट अनिवार्य करने की मांग की गई थी।
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फर्स्ट-एड किट की अनिवार्यता: आपात स्थिति से निपटने के लिए हर वाहन में मानक प्राथमिक उपचार किट का होना सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया था।
मंत्रालय को सुझाव भेजने की छूट
याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने फरवरी में केंद्र सरकार को इस संबंध में ज्ञापन दिया था, लेकिन जवाब न मिलने पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वे अपनी याचिका और सुझावों की प्रति सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) को भेज सकते हैं, ताकि सरकार नीतिगत स्तर पर इन सिफारिशों पर विचार कर आवश्यक कदम उठा सके।























