सरगुजा: लोक पर्वों का सीधा संबंध कृषि, पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं से होता है। सरगुजा अंचल की जनजातियों का लोक जीवन मूल रूप से कृषि और वन पर आधारित है, जहाँ कृषक समाज विभिन्न लोक पर्वों के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त करता है। इस अंचल के प्रमुख स्थानीय पर्वों—जैसे करमा, छेरता, गंगा दशहरा, कठोरी, हरेली, तीजा, नवाखाई आदि—में ‘करमा’ पर्व का विशेष स्थान है। यह मध्यवर्ती भारत की जनजातियों द्वारा मनाये जाने वाले सर्वाधिक लोकप्रिय लोक पर्वों में से एक है।

क्या है करमा पर्व और इसका महत्व?
‘करमा’ शब्द मूल रूप से ‘कर्म’ (परिश्रम) और ‘करम’ (भाग्य) को इंगित करता है। यह पर्व मानव को यह संदेश देता है कि “मनुष्य नियमित रूप से अच्छे कर्म करे और भाग्य भी उसका साथ दे।”
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यह पर्व पारंपरिक रूप से भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। सरगुजा अंचल में इस दिन बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और रात्रि में करम देवता की पूजा-अर्चना के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत पूरा करती हैं।

परंपरा और अनुष्ठान के अनूठे रंग
- करमी वृक्ष की पूजा: करमा पर्व के दौरान ‘करमी’ नामक वृक्ष की एक डाली को पारंपरिक रूप से गाँव के पटेल या प्रमुख व्यक्ति के आँगन में विधि-विधान से स्थापित किया जाता है। इसी डाली को ‘करम देवता’ का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है।
- ‘जाईं’ का शृंगार: त्यौहार से एक सप्ताह पूर्व (तीजा पर्व के दिन) महिलाओं द्वारा टोकरी में जौ, गेहूँ या मक्का बोया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘जाईं’ कहा जाता है। पर्व के दिन इसी ‘जाईं’ में मिट्टी का दीया जलाकर, फूलों से सजाकर और एक खीरा रखकर करम देवता के चरणों में अर्पित किया जाता है।
- पारंपरिक नृत्य और संगीत: पूजा के उपरांत रात भर करम देवता के चारों ओर घूम-घूम कर करमा नृत्य किया जाता है। महिलाएँ गोल घेरे में श्रृंखला बनाकर नृत्य करती हैं, जबकि मध्य में पुरुष गायक, वादक और नर्तक होते हैं। इस दौरान माँदर, झाँझ और मोहरी (शहनाई) की थाप पर पूरा अंचल गूँज उठता है। सूर्योदय के पूर्व करम देवता का विसर्जन किया जाता है।
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करमा पर्व से जुड़ी लोक कथा और नैतिक संदेश
करमा पर्व के पीछे कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। सबसे प्रमुख कथा सात भाइयों और करम देवता के आदर-सत्कार से जुड़ी है। कथा के अनुसार, किस तरह बड़े भाई द्वारा गुस्से में आकर करम डाल काट देने से पूरा परिवार संकट में घिर गया और खेत-खलिहान बंजर हो गए।
अपनी भूल का अहसास होने पर जब बड़ा भाई ‘करम देवता’ की खोज में निकला और रास्ते में मिले जीवों व मनुष्यों (मगर, घोड़ा, गाय-बछड़ा, और दो कष्ट झेल रही महिलाओं) के दुखों का निवारण किया, तब उसे पुनः अपने कर्म और भाग्य का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। यह कथा समाज को बड़ों का आदर-सम्मान करने, प्रकृति से प्रेम करने और कर्म पथ पर अडिग रहने का गहरा संदेश देती है।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में करमा जैसे लोक पर्व हमें हमारी संस्कृति, जड़ों और प्रकृति से जोड़े रखने का काम करते हैं। यह पर्व सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे, परिश्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महान माध्यम है।
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