क्षेत्रीय कला डेस्क : फैजान अशरफ़
लोक संगीत की दुनिया में कई कलाकार आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन कुछ अपनी आवाज से वक्त को मुट्ठी में कैद कर लेते हैं। जशपुर के एक गाॅव लोधमा की मिट्टी से उठकर नागपुरी संगीत की दुनिया पर राज करने वाले बुद्धमन सन्यासी इसी फेहरिस्त में सबसे ऊपर हैं। जशपुर की फिजाओं और पहाड़ों की ओट में जब मांदर की थाप गूंजती है तो समझ लीजिए कि जशपुर की माटी का बेटा, बुद्धमन सन्यासी गा रहा है। और बुद्धमन की आवाज आती है, तो पूरा अंचल एक जादुई सम्मोहन में बंध जाता है। उनके सुरों में वो जादू है कि जब वे आलाप लेते हैं, तो जशपुर के ऊँचे पहाड़ों में थिरकन होने लगती है और सुनने वालों के दिलों की धड़कन तेज हो जाती है।

ठेठ गायकी और सादगी का संगम
बुद्धमन सन्यासी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ठेठ और शुद्ध पारंपरिक गायन शैली है। उनकी गायकी में गमक और लाचारी का वह अद्भुत मेल मिलता है, जो सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाता है। इतने बड़े कलाकार होने के बावजूद वे आज भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़े हैं और कुनकुरी के पास अपने गाँव में एक साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। प्रशंसकों के लिए यही बात उन्हें अपनों जैसा बनाती है।
लोक संगीत के बेताज बादशाह
बुद्धमन सन्यासी का जादू जशपुर, सरगुजा और झारखंड के सीमावर्ती गांवों में सिर चढ़कर बोल रहा है। अब बड़े मंचों से कहीं ज्यादा उनकी सक्रियता विभिन्न ग्रामों में आयोजित होने वाले स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देखी जा रही है, जहाँ उन्हें सुनने के लिए मीलों दूर से लोग पैदल चलकर पहुँचते हैं। बुद्धमन सन्यासी ने आधुनिकता और परंपरा के बीच एक पुल बना दिया है। पुराने बुजुर्ग उनके गानों के बोल और सादगी के दीवाने हैं, तो वहीं नई पीढ़ी उनके गानों के नए रिमिक्स और म्यूजिक वीडियो पर थिरक रही है।

छत्तीसगढ़ की पंचायतों में हाई-टेक हुई ग्राम सभाएं, 75% पंचायतों में बोलकर दर्ज होने लगी कार्यवाही
चेतावनी: रेगिस्तान बनने की राह पर ‘छत्तीसगढ़ का स्विट्जरलैंड’, जशपुर का पाताल हुआ प्यासा
सूफी संगीत के फलक पर चमकता ‘नन्हा आफताब’: अजमत शाबरी
बुद्धमन सन्यासी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे चमक-धमक वाले शहरों से ज्यादा अपने गाँव की मिट्टी और अखड़ों (पारंपरिक नृत्य स्थल) को तवज्जो देते हैं। जब वे किसी छोटे गाँव के कार्यक्रम में पहुँचते हैं, तो वहां के बुजुर्गों और युवाओं के साथ उनका जुड़ाव देखते ही बनता है। वे केवल मंच पर गाते नहीं, बल्कि बीच-बीच में लोकल भाषा में लोगों से संवाद भी करते हैं।गांवों में उनका स्वागत आज भी मांदर की थाप और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है, जो यह दर्शाता है कि ग्रामीण जनता के बीच उनका सम्मान किसी राजकीय अतिथि से कम नहीं है।
पिठारू कांदा: छत्तीसगढ़ के जंगलों का ‘प्राकृतिक उपहार’ और आदिवासियों का पारंपरिक स्वाद
छत्तीसगढ़ का राष्ट्रीय कीर्तिमान: 10 माह में बनाए रिकॉर्ड 5 लाख पीएम आवास, देश में बना नंबर वन राज्य
एक धुन, जो इमोशन बन गई
बुद्धमन सन्यासी का नाम आते ही सबसे पहले जेहन में हवा उड़ाई देले जैसे कालजयी गानों ने मील का पत्थर साबित किया है। जिसकी धुन आज भी कानों में कौंधती है। यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि उस माटी की खुशबू है जिसे सुनकर सात समंदर पार बैठा जशपुरिया भी अपनी जड़ों की महक महसूस करने लगता है। पहाड़ों की हवा और माटी की महक समेटे इस गाने के बोल इतने सरल हैं कि गाँव का बच्चा हो या शहर का बुजुर्ग, हर कोई इस पर थिरकने लगता है। उनके सुरों में वो लहरा है जो पुरानी यादों को ताजा कर देती है और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाती है।

घर से दूर रहने वाले जशपुरिया युवाओं के लिए यह गाना नॉस्टेल्जिया का वो झोंका है, जो उन्हें उनकी जड़ों की याद दिला देता है। सुआ जानी और पड़की पेरेवा जैसे गीतों ने उन्हें हर उरांव परिवार के सुख-दुख का साथी बना दिया है।
झरनों के जिला में ‘शुद्धता’ की क्रांति: जशपुर की पहाड़ियों से घर की टोटी तक अब लैब का सख्त पहरा!
उनका प्रभाव भौगोलिक सीमाओं को लांघ चुका है। जशपुर में जहाँ वे माटी के गौरव हैं, वहीं छोटा नागपुर (झारखंड) में उन्हें सादरी भाषा का सांस्कृतिक रक्षक माना जाता है। जशपुर सरगुजा के अंचलों में उनके पारंपारिक गीत सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुके हैं। जब उनसे उनकी लोकप्रियता का राज पूछा गया, तो उन्होंने बड़ी सादगी से कहा कि बड़े मंचों पर चमक-धमक होती है, पर गाँव के अखड़े में जो प्यार मिलता है, उसकी तुलना नहीं हो सकती। वहां जब कोई बुजुर्ग सिर पर हाथ रखता है या युवा साथ नाचता है, वही मेरी असली कमाई है।
देश में बिछा जल परीक्षण प्रयोगशालाओं का जाल, अब आपके नल के पानी पर होगी पैनी नजर
बुद्धमन सन्यासी का संगीत जशपुर की वादियों में बहने वाली उस नदी की तरह है, जो समय के साथ और भी गहरी और मीठी होती जा रही है। उन्होंने साबित कर दिया है कि कलाकार कभी पुराना नहीं होता, वह बस खुद को नए सांचे में ढाल लेता है। आज वे न केवल एक गायक हैं, बल्कि उरांव और नागपुरी संस्कृति को विश्व पटल पर ले जाने वाले एक सच्चे सांस्कृतिक राजदूत हैं। बुद्धमन सन्यासी का संगीत जशपुर की वादियों में बहने वाली उस हवा की तरह है, जिसे रोका नहीं जा सकता कि वह बस रूह को छूकर गुजर जाती है और पीछे छोड़ जाती है एक कभी न खत्म होने वाली गूँज।
बांसुरी की तान और चूड़ियों की खनक: जतरा में परंपरा निभाने उत्साह और उमंग के साथ उमड़ रहा जनसैलाब”
हवा हवा करी देलेः एक कालजयी धुन
यह गाना बुद्धमन सन्यासी की उस खास शैली का प्रतिनिधित्व करता है जिसे श्सादगी भरा संगीत कहा जाता है। इस गाने के हिट होने के पीछे कई बड़े कारण रहे हैं, सादगी भरे शब्द, इस गाने के बोल इतने सरल और ग्रामीण परिवेश से जुड़े हैं कि गांव का बच्चा हो या शहर का बुजुर्ग, हर कोई इसे गुनगुनाने और थिरकने लगता है। इसमें पहाड़ की हवा और माटी की महक महसूस होती है। बुद्धमन जी ने इस गाने में अपनी खनकती आवाज की जिस श्रेंजश् का इस्तेमाल किया है, वह सीधे दिल को छूती है। ऊंचे सुरों में भी उनकी आवाज की मिठास कम नहीं होती। इस गाने में पारंपरिक वाद्य यंत्रों का जादू का जो तालमेल है, वह इसे डीजे और शादियों का सबसे पसंदीदा ट्रैक बना देता है। आज भी जशपुर की शादियों में इस गाने के बिना डांस फ्लोर अधूरा माना जाता है।
स्वाद और सेहत की अनमोल विरासत: विलुप्त होता औषधीय गुणों का खजाना ‘बड़हर’
अब बिना जेब से पैसे दिए होगा इलाज; AIIA और 32 बीमा कंपनियों के बीच ऐतिहासिक समझौता
किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम में जब बुद्धमन सन्यासी मंच पर आते हैं, तो जनता की सबसे पहली और सबसे बड़ी फरमाइश इसी गाने की होती है। ष्हवा उड़ाई देलेष् बजते ही पूरा पंडाल झूम उठता है।यह गाना साबित करता है कि अगर संगीत में सच्चाई और अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम हो, तो वह दशकों तक लोगों के कानों में रस घोलता रहता है। बुद्धमन सन्यासी ने इस गाने के जरिए उरांव और नागपुरी लोक संगीत को एक नई ऊंचाई दी।
बेबाक और देसी स्वैग
बुद्धमन सन्यासी ने दिखा दिया है कि कलाकार कभी पुराना नहीं होता, वह बस खुद को नए सांचे में ढाल लेता है। उनका यह डिजिटल सफर और नागपुरी संगीत को विश्व पटल पर ले जाने का एक बड़ा जरिया बन रहा है।बुद्धमन सन्यासी का संगीत जशपुर की वादियों में बहने वाली उस नदी की तरह है, जो समय के साथ और भी गहरी और मीठी होती जा रही है।

बुधमन सन्यासी के गीत आधुनिक नागपुरी संगीत जगत में एक ऐसी लहर की तरह हैं, जो पारंपरिक लोक संवेदना और समकालीन शहरी तड़के का अनूठा संगम पेश करते हैं। जहाँ नागपुर से आले गोरी और हवा हवा करी देलेःजैसे गानों में एक जबरदस्त पार्टी वाइब और युवाओं को थिरकाने वाली ऊर्जा है, वहीं दुनिया है खेल तमाशा और फोटो में रही जाबे जैसे गीतों में जीवन की नश्वरता और दर्शन की गहरी झलक मिलती है।
चुनौतियों के पाले में तपकर निखरा जशपुर का ‘लाल हीरा’, अब ग्लोबल मार्केट पर नजर
मोर सैयारा’ का जादू: नितेश कच्छप के नए गाने ने मचाया धमाल, सोशल मीडिया पर रिकॉर्ड तोड़ व्यूज
स्वाद में बेमिसाल, कीमत में कमाल: जशपुर का ‘देसी किंग’, मटन-चिकन के शौकीन भी इसके मुरीद!
दार्शनिक सन्यासी और रूमानी कल्पनाएँ
बुधमन के गीतों को अगर हम करीब से देखें, तो वे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नागपुरी पॉप कल्चर के विकास का एक दस्तावेज हैं। एक तरफ उनके गानों में आधुनिक बीट्स और कैची हुक लाइन्स (जैसे पानी पानी करी देले) का बोलबाला है, जो उन्हें आज के क्लब्स और शादियों की जान बनाता है। दूसरी तरफ, रघुपति राघव राजा राम और जिनगी के नखे भरोसा जैसे गीतों के माध्यम से वे उस भक्त और दार्शनिक सन्यासी को भी जीवित रखते हैं, जो नागपुरी संस्कृति की सादगी और मिट्टी से जुड़ा है।उनकी रचनाओं में जहाँ तोर करिया बिंदिया और चाँद के पार जैसी कोमल रूमानी कल्पनाएँ हैं, वहीं छोड़ा पगला है रे जैसी पंक्तियों में एक बेबाक और देसी स्वैग झलकता है।
अब राजस्व सेवाएँ एक क्लिक दूर : भुइयां व्हाट्सऐप चैटबॉट और ऑटो-डाइवर्ज़न सुविधा का हुआ शुभारंभ
अब शिक्षा की कमान संभालेंगे ‘Frontier AI’ मॉडल! जानिए क्या बदलेगा क्लासरूम में…?
बुधमन सन्यासी का संगीत उस पुल की तरह है जो सरना और अखड़ा की पुरानी धुनों को आज के सिंथेसाइजर और Bass से जोड़ता है। वे दिखाते हैं कि नागपुरी गाना केवल गाँव की पगडंडियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जशपुर से छोटा नागपुर के गाॅव गाॅंव तक के आधुनिक जीवन की धड़कन बन चुका है।

सावधान! आधार में जन्मतिथि बदलना अब नहीं होगा आसान, UIDAI ने कड़े किए नियम
डिजिटल अवतारः रिल्स से लेकर यूट्यूब तक धमाका
समय के साथ कदम मिलाते हुए बुद्धमन दादा अब एक डिजिटल लोक नायक के रूप में उभरे हैं। वे अब केवल मंचों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इंस्टाग्राम रिल्स और यूट्यूब शॉर्ट्स के जरिए सीधे नई पीढ़ी के मोबाइल तक पहुँच रहे हैं। उनके नए म्यूजिक वीडियो में जशपुर के झरने, वादियाँ और ड्रोन शॉट्स का बेहतरीन इस्तेमाल हो रहा है। वे खुद युवाओं के साथ रिल्स बना रहे हैं, जिससे हवा हवा करी देले और करी देले जैसे गानों को करोड़ों व्यूज मिल रहे हैं। उनका अपना बुद्धमन स्टूडियो आज उभरते गायकों के लिए एक पाठशाला बन गया है, जहाँ वे नई प्रतिभाओं को तराश रहे हैं। वे साबित कर रहे हैं कि लोक संगीत कभी पुराना नहीं होता, वह बस समय के साथ और भी निखरता जाता है।
🥃 ”बाबू मोशाय… अब होली पर जाम भी होगा और इंतज़ाम भी!” छत्तीसगढ़ में ड्राई डे की छुट्टी।
”बेखुदी का वन-शॉट: कुदरती जाम में डूबी हवाएँ और दरख्तों का इश्किया मिजाज”
यूट्यूब पर बुद्धमन सन्यासी के कुल व्यूज करोड़ों में हैं, जो यह साबित करता है कि जशपुर की माटी का यह कलाकार अब ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर अपनी संस्कृति का झंडा गाड़ रहा है। रिल्स और छोटे वीडियो बनाकर उन्होंने अपनी पहुंच उन युवाओं तक भी बना ली है जो पहले केवल डीजे गानों तक सीमित थे।
समय के साथ कदम मिलाते हुए बुद्धमन जी अब एक डिजिटल कलाकार के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं। वे अब केवल मंचों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इंस्टाग्राम रिल्स और यूट्यूब शॉर्ट्स के जरिए सीधे नई पीढ़ी तक पहुँच रहे हैं। उनके नए गाने जैसे बेरहम बेदर्दी और हद से प्यार बढ़ते जाथे बेहतरीन ड्रोन शॉट्स और आधुनिक एडिटिंग के साथ रिलीज हो रहे हैं, जिन्हें करोड़ों व्यूज मिल रहे हैं। वे अक्सर गाँवों के खेतों और वादियों में स्थानीय युवाओं के साथ रिल्स शूट करते हैं, जिससे सुदूर अंचल की प्रतिभा को भी वैश्विक मंच मिल रहा है।
2026 में इस दिन से शुरू होगा हिंदू नववर्ष,विक्रम संवत 2083 का होगा शुभारंभ
लोधमा की पगडंडियों से निकलकर डिजिटल स्क्रीन तक का सफर तय करने वाले बुद्धमन जी आज छोटा नागपुर के गौरव बन चुके हैं। उनकी गायकी में एक तरफ सन्यासी वाली सादगी है, तो दूसरी तरफ लोक-नायक वाला वो स्वैग, जो गाँव के अखाड़े से लेकर यूट्यूब के ट्रेंडिंग पेज तक एक समान जादू बिखेरता है।

छोटा नागपुर (झारखंड), सरगुजा और जशपुर के इलाकों में बुद्धमन सन्यासी का रिस्पॉन्स किसी लोक-सांस्कृतिक सुपरस्टार जैसा है। इन क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता केवल एक गायक के तौर पर नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में है।जशपुर और कुनकुरी क्षेत्र में बुद्धमन सन्यासी को एक पारिवारिक सदस्य की तरह प्यार मिलता है।चूँकि वे यहीं के लोधमा गाँव के हैं, स्थानीय लोग उन्हें बुधमन दादा या बुधमन भाई कहकर पुकारते हैं। यहाँ की शादियों मेले धार्मिक आयोजन और गाॅंव के कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनके गानों का बजना अनिवार्य है। जशपुर के उभरते हुए गायकों के लिए वे एक जीवित मिसाल हैं कि गाँव में रहकर भी डिजिटल दुनिया में करोड़ों व्यूज हासिल किए जा सकते हैं।
1 अप्रैल से लागू होगा नया आयकर कानून, टैक्सपेयर्स को मिलेगी बड़ी राहत
NCERT : “ई मैजिक बॉक्स” अब बच्चों की पढ़ाई में लगेगा एआई का जादू
झारखंड के सिमडेगा, गुमला, लोहरदगा और रांची जैसे क्षेत्रों में बुद्धमन सन्यासी की जबरदस्त मांग है। छोटा नागपुर का आदिवासी समुदाय उन्हें अपनी भाषा का सबसे बड़ा रक्षक मानता है। उनके गीतों में जो ठेठ नागपुरी पुट होता है, वह झारखंडी संस्कृति से पूरी तरह मेल खाता है।झारखंड के किसी भी बड़े सांस्कृतिक महोत्सव (जैसे करमा या सरहुल) में बुद्धमन की मौजूदगी भीड़ खींचने की गारंटी मानी जाती है।
मोहब्बत का ‘देसी वर्जन’: जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा श्रृंगार और सरई ही सबसे बड़ा उपहार है

झाारखंड ओडिसा के साथ छततीसगढ के सरगुजा संभाग के इलाकों में भी उनका रिस्पॉन्स बहुत सकारात्मक है। यहाॅ की सांस्कृतिक परंपराएं काफी मिलती-जुलती हैं। उनके करमा और दशहरा गीत गाँवों में भी उसी चाव से सुने जाते हैं। सरगुजा के युवा अब उनके नए वीडियो और रील्स को काफी पसंद कर रहे हैं। उनके गानों पर बनने वाली रील्स में सरगुजा संभाग के युवाओं की भागीदारी काफी ज्यादा दिखती है।
‘PM राहत’ योजना को मंजूरी, सड़क दुर्घटना पीड़ितों का होगा मुफ्त इलाज
CGHS लाभार्थियों के लिए बड़ी राहत: 10 लाख रुपये तक के मेडिकल क्लेम अब विभाग स्तर पर ही होंगे मंजूर
बुद्धमन सन्यासी जी के व्यक्तित्व और उनकी गायकी को उन्हीं के चिर-परिचित ठेठ और सरल अंदाज में जानते है लोक कलाकार बुद्धमन सन्यासी के साथ सीधी बात-
प्रश्न: बुद्धमन दादा, आपने उस दौर में गाना शुरू किया जब न यूट्यूब था न सोशल मीडिया। आज के डिजिटल युग को आप कैसे देखते हैं?
जवाबः देखिए, समय तो बदलता ही है। हमारे समय में कैसेट और सीडी का दौर था, लोग दुकानों में जाकर गाने ढूँढते थे। आज सब कुछ मोबाइल में है। मुझे खुशी होती है कि अब मेरे गाने जशपुर से निकलकर सात समंदर पार भी सुने जा रहे हैं। डिजिटल होने से फायदा ये हुआ है कि अब कलाकार को किसी का इंतजार नहीं करना पड़ता, बस रिकॉर्ड करो और दुनिया को सुना दो।
प्रश्न : आपका गाना हवा उड़ाई देले आज भी हर शादी और पार्टी की जान है। इस गाने के पीछे की क्या कहानी है?
जवाबः यह गाना मिट्टी से जुड़ा है। जब हम छोटे थे, तो देखते थे कि कैसे पहाड़ों की हवा और माटी की खुशबू हमारे मन को खुश कर देती थी। उसी सादगी को मैंने शब्दों में पिरोया। मुझे उम्मीद नहीं थी कि यह इतना बड़ा हिट होगा, पर लगता है लोगों ने इसमें अपनी जड़ें ढूँढ लीं। आज भी जब लोग इस पर थिरकते हैं, तो मेरा दिल गदगद हो जाता है।
Digital Revolution : 4 साल में 11 गुना बढ़ा लेन-देन, भारतीय अर्थव्यवस्था की नई धड़कन बना UPI
प्रश्न: अब आप नए गानों के लिए वीडियो और रिल्स भी बना रहे हैं। क्या यह युवाओं से जुड़ने की एक कोशिश है?
जवाबः बिल्कुल! अगर हम समय के साथ नहीं चलेंगे, तो हमारी नागपुरी संस्कृति पीछे छूट जाएगी। आज का युवा रिल्स देख रहा है, तो मैंने सोचा क्यों न मैं भी रिल्स के जरिए उन तक पहुँचूँ। जब मैं युवाओं को अपने गानों पर वीडियो बनाते देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि हमारी संस्कृति सुरक्षित हाथों में है।
प्रश्नः आपने महुआटोली (कुनकुरी) में अपना खुद का स्टूडियो खोला है। इसके पीछे आपका क्या उद्देश्य है?
जवाबः हमारे क्षेत्र में प्रतिभा की कमी नहीं है, पर सुविधाओं की कमी थी। जशपुर के कलाकारों को रिकॉर्डिंग के लिए रांची या रायपुर भागना पड़ता था। मैंने श्बुद्धमन सन्यासी स्टूडियोश् इसीलिए खोला ताकि हमारे स्थानीय भाई-बहनों को अपने घर के पास ही एक मंच मिल सके और वे भी अपनी आवाज दुनिया तक पहुँचा सकें।
डिजिटल भारत 2026: हर जिले में 5G, हर पंचायत में इंटरनेट और धोखाधड़ी करने वालों पर सीधा प्रहार
प्रश्नः आप विभिन्न गांवों में जाकर आज भी कार्यक्रम करते हैं। क्या बड़े मंचों के मुकाबले गांवों में गाना ज्यादा सुकून देता है?
जवाबः बड़े मंचों पर चमक-धमक होती है, पर गाँव के अखाड़े में जो प्यार मिलता है, उसकी तुलना नहीं हो सकती। गाँव के लोग सीधे दिल से जुड़ते हैं। वहां जब कोई बुजुर्ग आकर सिर पर हाथ रखता है या युवा साथ में नाचता है, तो वही मेरी असली कमाई होती है। मैं जशपुर की माटी का बेटा हूँ और मरते दम तक गाँव की पगडंडियों से जुड़ा रहूँगा।
महुआ,सरई के फूल और आम के बौर की रसीली खुशबू से जंगल बना कुदरत का असली मयखाना!
बुद्धमन सन्यासी का संगीत जशपुर की वादियों में बहने वाली उस नदी की तरह है, जो समय के साथ और भी गहरी और मीठी होती जा रही है। उन्होंने दिखा दिया है कि कलाकार कभी पुराना नहीं होता, वह बस खुद को नए सांचे में ढाल लेता है। उनका यह सफर उरांव और नागपुरी संगीत को विश्व पटल पर ले जाने का एक बड़ा जरिया बन रहा है।

