रायपुर | 19 मार्च 2026
छत्तीसगढ़ विधानसभा में ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ पर चर्चा के दौरान एक ऐतिहासिक और भावुक दृश्य देखने को मिला, जब जशपुर की विधायक श्रीमती रायमुनी भगत ने सदन के पटल पर धर्मांतरण की उन कड़वी सच्चाइयों को उजागर किया, जो दशकों से जनजातीय समाज के भीतर एक ‘दीमक’ की तरह काम कर रही हैं।

हिंदू नववर्ष, गुड़ी पड़वा और सरहुल पूजा के पावन अवसर पर अपनी बात रखते हुए रायमुनी भगत ने इस विधेयक को छत्तीसगढ़ की अस्मिता और संस्कृति को बचाने वाला ‘रक्षा कवच’ करार दिया। उन्होंने गृह मंत्री विजय शर्मा का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह विधेयक केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की दिशा और दशा तय करने वाला एक संकल्प पत्र है, जो बाहरी ताकतों द्वारा बुने गए धर्मांतरण के जाल को तोड़ने का साहस रखता है।
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विधायक रायमुनी भगत ने अत्यंत आक्रामक तेवर अपनाते हुए सदन को अवगत कराया कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल क्षेत्रों, विशेषकर जशपुर और आसपास के जनजाति क्षेत्रों में एक सुनियोजित षडयंत्र चल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विदेशी और बाहरी ताकतें पहाड़ी कोरवा, उरांव, बैगा, नगेरिया, पंडो और बिरहोर जैसी उन जनजातियों को निशाना बना रही हैं जिन्हें ‘राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र’ कहा जाता है।
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ये गिरोह गांवों में अपना जाल बिछाकर उन लोगों पर घात लगाकर बैठे रहते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं या जिन्हें शिक्षा का अभाव है। रायमुनी भगत ने कड़े शब्दों में कहा कि ये ताकतें अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को उनके पैतृक धर्म और पुरखों की रीति-रिवाजों से काटकर उन्हें ईसाई धर्म की ओर धकेल रही हैं, जिससे सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह बिखर रहा है।
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सदन में चर्चा के दौरान उन्होंने ‘दोहरा लाभ’ लेने की प्रवृत्ति पर भी एक गंभीर तथ्य रखा, जिसे सुनकर सदस्य दंग रह गए। उन्होंने बताया कि धर्मांतरण करने वाले लोग स्वेच्छा से धर्म तो बदल लेते हैं, लेकिन सरकारी दस्तावेजों और जाति प्रमाण पत्रों में स्वयं को हिंदू ही दर्शाते हैं ताकि वे संविधान प्रदत्त आरक्षण का लाभ उठा सकें।
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उन्होंने मांग की कि इस पूरे मामले की गहन छानबीन होनी चाहिए, क्योंकि यह उन मूल निवासियों के अधिकारों का हनन है जो अपनी संस्कृति पर अडिग हैं। रायमुनी भगत ने पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा जाति प्रमाण पत्र के आवेदन से ‘धर्म’ का कॉलम हटाए जाने पर भी कड़ा एतराज जताया और उसे पुनः अनिवार्य करने की वकालत की, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कौन व्यक्ति वास्तव में किस आस्था का पालन कर रहा है।
विधायक ने जशपुर क्षेत्र की उन मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली घटनाओं का भी उल्लेख किया, जिसे उन्होंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है। उन्होंने बताया कि कैसे एक गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से तीन दिनों तक तड़पती रही, लेकिन उसे अस्पताल ले जाने के बजाय प्रार्थना और चंगाई सभाओं के भरोसे रखा गया।
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अंततः स्वयं रायमुनी भगत ने हस्तक्षेप कर उसे अस्पताल पहुँचाया। एक अन्य घटना में, एक छह साल के बच्चे की मौत के बाद एक पास्टर द्वारा उसे ‘जीवित’ करने का झूठा नाटक किया गया, जिससे समय पर चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण उस मासूम का शरीर सड़ने लगा और उसकी जान चली गई। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर भोली-भाली जनता को इस प्रकार के अंधविश्वास में धकेलना किसी अपराध से कम नहीं है।
रायमुनी भगत ने ‘पत्थरगढ़ी’ और ‘पेसा एक्ट’ के दुरुपयोग पर भी विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे धर्मांतरित लोग और कुछ संस्थाएं इन कानूनों की गलत व्याख्या कर गांवों में बाहरी व्यक्तियों और प्रशासनिक अधिकारियों का प्रवेश वर्जित कर देती हैं, ताकि वहां उनकी समानांतर सत्ता चल सके।
उन्होंने बचपन का अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि मिशनरी स्कूलों में बच्चों के नाम के आगे से उनके मूल उपनाम (जैसे भगत) हटाकर उन्हें अन्य उपनामों से जोड़ दिया जाता है ताकि उनकी सांस्कृतिक जड़ें काटी जा सकें। उन्होंने अंत में भावुक अपील करते हुए कहा कि धर्मांतरण परिवार को दो टुकड़ों में बांट देता है, जहां भाई-भाई के बीच वैमनस्य पैदा होता है और जन्म से मृत्यु तक के पैतृक संस्कार लुप्त हो जाते हैं।
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मतांतरण को ‘देशांतरण’ का द्वार बताते हुए उन्होंने इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करने का आग्रह किया ताकि छत्तीसगढ़ अपनी कर्मा, सरहुल, सुआ और पंथी जैसी महान परंपराओं को सुरक्षित रख सके।


