जशपुरनगर। शुक्रवार, 26 जून को जशपुर जिले भर में मोहर्रम का दसवां दिन अकीदत और गम के साथ मनाया गया। इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में जशपुरनगर, कुनकुरी, बगीचा, पत्थलगांव, दोकड़ा और पोंगरो सहित पूरे जिले में मातमी जुलूस निकाले गए। मुस्लिम समाज के लोगों ने जुल्म के खिलाफ हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करते हुए अमन और शांति का संदेश दिया।
करबला की शहादत: जुल्म के खिलाफ एक मिसाल
इस्लामिक इतिहास के अनुसार, 1400 साल पहले करबला की सरजमीं पर पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को यजीदी सेना ने घेराबंदी कर शहीद कर दिया था। यह शहादत हक और बातिल (सत्य और असत्य) के बीच के संघर्ष का प्रतीक मानी जाती है। इसी कुर्बानी को याद कर हर साल मोहर्रम की दसवीं तारीख को मुस्लिम धर्मावलंबी गमगीन होकर जुलूस निकालते हैं और कर्बला के शहीदों को खिराजे-अकीदत पेश करते हैं।
रोजे और इबादत का दौर
मोहर्रम का महीना शुरू होते ही अकीदतमंदों ने पहले दिन से ही इबादत का सिलसिला शुरू कर दिया था। कई लोगों ने दस दिनों तक रोजे रखे और मस्जिदों व इमामबाड़ों में विशेष प्रार्थनाएं कीं। मौलाना मंसूर आलम ने इस दौरान करबला की घटनाओं का जिक्र करते हुए लोगों को अत्याचार के खिलाफ डटकर खड़े होने और इंसानियत के रास्ते पर चलने की सीख दी।
ताजियों की परंपरा और अखाड़ों का प्रदर्शन
जुलूस का मुख्य आकर्षण खूबसूरत ताजिये रहे। जानकारों के अनुसार, हजरत इमाम हुसैन बचपन में ताजियों के साथ खेला करते थे, उन्हीं की याद में हर साल इन्हें विशेष सजावट के साथ तैयार किया जाता है। जशपुर में इमामबाड़ों से निकले इन ताजियों के साथ जुलूस जब शहर के प्रमुख मार्गों जैसे दर्जी मोहल्ला, महाराजा चौक और पुराने पैलेस के सामने से गुजरा, तो नजारा देखने लायक था।
जुलूस में शामिल युवाओं और बच्चों ने अखाड़ों में लाठी, तलवार और बर्छे के साथ हैरतअंगेज करतब दिखाकर उपस्थित जनसमूह को चकित कर दिया। इन प्रदर्शनों के जरिए उन्होंने कर्बला के उस ऐतिहासिक युद्ध के जज्बे को जीवित करने का प्रयास किया।
सौहार्द का प्रतीक
इस मातमी जुलूस में मुस्लिम समाज के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोगों ने भी बड़ी संख्या में शिरकत की। जशपुर में मोहर्रम का यह आयोजन न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र रहा, बल्कि आपसी भाईचारे और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की मिसाल भी पेश की।

