आदिवासी अंचलों में कुछ इस तरह मनता है फगुआ” ……………..
जशपुर:
जब फागुन की मदमस्त हवाएं पुराने पत्तों को विदा कर पुटकल (पाकड़) की टहनियों पर सिंदूरी कोंपलें सजाती हैं, तो समझ लीजिए कि छत्तीसगढ़ के सुदूरवर्ती जंगलों और झारखंड की वादियों में ‘पुटकल’ का उत्सव शुरू हो गया है। यह महज एक जंगली सब्जी नहीं, बल्कि आदिवासियों की वह अनमोल विरासत है, जिसे उन्होंने सदियों से अपनी हथेली पर सहेज कर रखा है।
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60 दिनों का मेहमान, साल भर का वरदान
वसंत के आगमन के साथ ही Ficus geniculata (पुटकल) के पेड़ों पर नई कोमल लाल कलियां खिलने लगती हैं। साल में केवल दो महीने के लिए मिलने वाली यह जंगली सब्जी आज के दौर में किसी ‘ग्लोबल सुपरफूड’ से कम नहीं है, जिसकी धमक अब गांवों की पगडंडियों से निकलकर शहरों के आलीशान डाइनिंग टेबल तक पहुंचने लगी है। बड़े-बड़े शेफ भी अब इसके खटास भरे बेमिसाल स्वाद के मुरीद हो रहे हैं।
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कड़ा संघर्ष और ‘पुटकल सुकटी’ का जादू
ग्रामीण महिलाएं अल सुबह जंगलों की ओर निकल जाती हैं और कड़ी मशक्कत के बाद इन कोमल कलियों को चुनकर लाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसे ताजा खाने से ज्यादा उबालकर और धूप में सुखाकर ‘पुटकल सुकटी’ के रूप में इस्तेमाल करने का चलन है। इसकी खटास भरी चटनी और सब्जी का स्वाद किसी भी महंगे पकवान को मात दे सकता है। जब तपती गर्मियों में हरी सब्जियों का अकाल पड़ता है, तब यही पुटकल आदिवासियों के शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है।
सेहत का खजाना: रोगों की कुदरती काट
जानकारों और स्थानीय वैद्यों के अनुसार, पुटकल में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स, आयरन और फाइबर इसे डायबिटीज और पेट के रोगों के लिए एक अचूक कुदरती दवा बनाते हैं। चूँकि इसे उगाने के लिए किसी खाद या कीटनाशक की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए यह पूरी तरह ऑर्गेनिक है और आधुनिक मिलावटी दौर में सेहत का आखिरी पहरेदार बना खड़ा है। इसमें मौजूद विटामिन की प्रचुर मात्रा स्थानीय लोगों को साल भर ऊर्जावान बनाए रखती है।
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आदिवासी अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार
जशपुर के ग्रामीण हाट-बाजारों में नीले तिरपाल पर सजे पुटकल के छोटे-छोटे ढेर इस बात का प्रतीक हैं कि लोग अब रसायनों वाली सब्जियों को छोड़कर पारंपरिक और जंगली खाद्यों की ओर लौट रहे हैं। जहाँ पहले यह केवल स्थानीय स्तर तक सीमित था, वहीं अब इसकी बढ़ती मांग ने इसे ₹500 प्रति किलो तक के भाव पर पहुँचा दिया है। हालंकि बाजार में ये किलो में नहीं बिकता है.
छोटा नागपुर की धरती का यह अनूठा स्वाद न केवल थाली की शोभा बढ़ा रहा है, बल्कि हमारी प्राचीन खान-पान संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी जीवित रखे हुए है।

