जशपुर के 1000 साल पुराना रियासती दशहरे का Vibe बिल्कुल Next Level है! जब देवी को जाता है VIP Invite और Bird करती है Future Predict!
जशपुर/नई दिल्ली। हिंदू धर्म में असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक विजयादशमी (दशहरा) का पर्व केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि इस दिन दुर्लभ ‘नीलकंठ’ पक्षी के दर्शन की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि दशहरे के पावन अवसर पर नीले पंखों वाले इस पक्षी का दीदार होने से व्यक्ति के सोए भाग्य जाग जाते हैं और पूरे वर्ष शुभ फल की प्राप्ति होती है।
भगवान श्रीराम और रावण वध से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, लंका पर चढ़ाई और रावण से युद्ध से पहले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को नीलकंठ पक्षी के दर्शन हुए थे। इसे अधर्म पर विजय का दैवीय संकेत माना गया था, जिसके बाद श्रीराम ने रावण का संहार कर धर्म की पुनः स्थापना की थी। इसी कारण दशहरे के दिन इसे देखना जीत और सफलता का प्रतीक माना जाता है।
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महादेव का प्रत्यक्ष स्वरूप है नीलकंठ
धार्मिक मान्यताओं में नीलकंठ को साक्षात देवों के देव महादेव का ही प्रतिनिधि स्वरूप माना जाता है। समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला, तब संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया था, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। शास्त्रों के अनुसार, इस पक्षी को भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है, जिसके चलते विजयादशमी पर इसके दर्शन से व्यक्ति के सभी कष्ट, दरिद्रता और ग्रह दोष दूर होते हैं तथा व्यापार व आजीविका में प्रगति मिलती है।
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जशपुर की अनूठी परंपरा: बालाजी की मौजूदगी में नीलकंठ के दर्शन
छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक जशपुर में यह परंपरा रियासतकाल से आज भी जीवंत है। यहां रावण दहन से पूर्व भगवान बालाजी की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें रियासत के राजा और मंदिर के मुख्य आचार्य-पुजारी शामिल होते हैं:
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दहन से पूर्व दर्शन: रणजीता मैदान (रैनी डांड) में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन से पहले भगवान बालाजी के रथ से नीलकंठ पक्षी के दर्शन कराए जाते हैं।
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उड़ान की दिशा से भविष्य का आकलन: जशपुर में यह जनमान्यता है कि आजाद किए जाने के बाद नीलकंठ जिस दिशा में उड़ान भरता है, उसी से आने वाले वर्ष का भविष्य तय होता है।
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यदि पक्षी पूर्व या उत्तर दिशा की ओर उड़ता है, तो इसे संपूर्ण अंचल और विश्व के लिए सुख-शांति, अच्छी पैदावार और मंगलकारी वर्ष का संकेत माना जाता है।
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यदि इसकी उड़ान अन्य दिशाओं में होती है, तो उसे संभावित प्राकृतिक आपदाओं या कठिनाइयों की चेतावनी के रूप में देखा जाता है।
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सुरों के सन्यासी बुद्धमनः जिनकी लहराती आवाज और सुर से हवा गुनगुनाती है,माटी महकती है और पहाड़ थिरकते हैं, लोगों की धड़कनें तेज हो जाती है, जशपुर की खुशबू और छोटा नागपुर का गौरव
आधुनिकता के बीच आस्था की डोर
आज जंगलों के सिमटने और पर्यावरणीय बदलावों के कारण नीलकंठ पक्षी का दिखना दुर्लभ हो चुका है, लेकिन विजयादशमी के दिन इसे निहारने की लोक-आस्था आज भी उतनी ही प्रगाढ़ है। लोग दशहरे की सुबह से ही इसकी एक झलक पाने को उत्सुक रहते हैं, ताकि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सफलता का संचार हो सके।



