जशपुर में रियासतकाल की भव्यता और जनजातीय आस्था का अनूठा दशहरा

जशपुर। आधुनिकता की चकाचौंध के बीच छत्तीसगढ़ का जशपुर आज भी अपनी करीब एक हजार साल पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। शक्ति उपासना और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक ‘जशपुर दशहरा’ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राजपरिवार और जनजातीय समुदाय के अटूट सामंजस्य का जीवंत प्रमाण है। नवरात्र के पहले दिन से लेकर रावण दहन तक, समाज के विभिन्न वर्गों को सौंपी गई जिम्मेदारियों को आज भी संबंधित परिवारों के सदस्य 27 पीढ़ियों से निष्ठापूर्वक निभाते आ रहे हैं।

राजा सुजान राय ने शुरू की थी 1000 साल पुरानी परंपरा
जशपुर रियासत के उत्तराधिकारी रणविजय सिंह देव के अनुसार, इस पर्व का इतिहास 800 से 1000 वर्ष पुराना है। रियासतकाल में यहां डोम राजाओं का शासन हुआ करता था, जिन्हें तत्कालीन राजा सुजान राय ने पराजित कर इस ऐतिहासिक दशहरा उत्सव की नींव रखी थी। धर्म, जाति और संप्रदाय की सीमाओं से परे यह महाउत्सव आज पूरे अंचल में सामाजिक सद्भाव और समरसता का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।
file photo jashpur dashahara
800 साल पुराना मां काली मंदिर और 21 आचार्यों का अनुष्ठान
दशहरा उत्सव का शुभारंभ नवरात्र के प्रथम दिन विश्व कल्याण की कामना के साथ होता है। जशपुर के अधिष्ठाता भगवान बालाजी और 800 वर्ष पुराने ऐतिहासिक काली मंदिर से अस्त्र-शस्त्र लाकर विधिवत पूजन किया जाता है।
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अखंड ज्योति और जलाभिषेक: ‘पक्की डाड़ी’ से गाजे-बाजे के साथ पवित्र जल लाकर कलश स्थापना और अखंड दीप प्रज्वलित किया जाता है।

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त्रिविध साधना पद्धति: राजपुरोहित पंडित विनोद मिश्रा के अनुसार, राजपरिवार, 21 आचार्यों, जनजातीय बैगाओं और नागरिकों की मौजूदगी में मां दुर्गा की वैदिक, राजसी और तांत्रिक विधि से विशेष आराधना की जाती है। इस मंदिर में मां काली की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा सदियों पूर्व आचार्य खगेश्वर मिश्रा ने कराई थी। उत्सव की पूर्णता के लिए बैगा, पुजारी और आचार्यों की संयुक्त उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है।
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जुरगुम गांव से वनदुर्गा को न्योता: बेल फल के रूप में देवी का आगमन
इस उत्सव से जुड़ी एक रहस्यमयी और तांत्रिक परंपरा षष्ठी तिथि को निभाई जाती है:
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षष्ठी को आमंत्रण: मुख्य देवी मंदिर से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित ग्राम जुरगुम में शाम को एक भव्य झांकी पहुंचती है। यहां तांत्रिक बेल के पेड़ (जिस पर आम के पौधे भी उगे हैं) के समक्ष वनदुर्गा, मां काली की 64 योगिनियों और नियंत्रित बुरी आत्माओं को अनुष्ठान में शामिल होने का न्योता दिया जाता है।

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सप्तमी को प्रतिष्ठा: सप्तमी की सुबह आचार्य पुनः शोभायात्रा के साथ जुरगुम पहुंचते हैं और बेल फल के प्रतीक स्वरूप वनदुर्गा को लाकर मंदिर में स्थापित करते हैं।
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भगवान बालाजी के काष्ठ रथ की सवारी और ‘रैनी डांड’ पर लंका दहन
विजयादशमी के दिन आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है। जिले भर से जुटे हजारों श्रद्धालुओं के बीच भगवान बालाजी का विशेष पूजन कर उन्हें लकड़ी से बने पारंपरिक रथ में विराजित किया जाता है:
दो रथों का कारवां: एक रथ में स्वयं भगवान बालाजी और दूसरे रथ में राजपरिवार के सदस्य व राजपुरोहित सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं।
रैनी डांड (रणजीता स्टेडियम): शोभायात्रा ऐतिहासिक रणजीता स्टेडियम पहुंचती है, जिसे रियासतकाल में ‘रैनी डांड’ कहा जाता था। यहां नगर के विभिन्न हिस्सों से आईं मां दुर्गा की झांकियों का मिलन होता है।
चार पुतलों का दहन: कृत्रिम लंका निर्माण के बाद हनुमान स्वरूप द्वारा लंका दहन कराया जाता है। इसके पश्चात रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद और अहिरावण के विशालकाय पुतलों का दहन होता है।
नीलकंठ पक्षी की उड़ान से तय होता है भविष्य
दशहरा के अंतिम चरण में अपराजिता पूजा संपन्न की जाती है। इसके तुरंत बाद राजपरिवार के सदस्यों द्वारा भगवान के रथ से नीलकंठ पक्षी को आकाश में मुक्त करने की अनूठी रस्म निभाई जाती है। इस पक्षी को विशेष रूप से बैगा समुदाय द्वारा बालाजी मंदिर लाया जाता है।
रावण वध के समय रावण ने पवनपुत्र हनुमान के वास्तविक स्वरूप को पहचाना था, जहां हनुमान जी ने भगवान शिव के नीलकंठ रूप में दर्शन देकर रावण को मुक्ति दिलाई थी।
जशपुर में मान्यता है कि यदि मुक्त किया गया नीलकंठ पूर्व या उत्तर दिशा की ओर उड़ता है, तो आने वाला वर्ष पूरे विश्व और क्षेत्र के लिए सुख-समृद्धि व शांति लेकर आता है। वहीं अन्य दिशाओं में उड़ान को प्राकृतिक आपदा और संकट का संकेत माना जाता है।







