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जशपुर। छत्तीसगढ़ की माटी की महक और लोक संस्कृति का प्रतीक ‘जतरा मेला’ इन दिनों अपनी पूरी रंगत में है। शहर से लेकर सुदूर गांवों तक, हर तरफ उत्सव का माहौल है। फागुन के करीब आते ही जतरा मेले ने जशपुर के जनजीवन में एक नई ऊर्जा भर दी है।

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मेले का यह सफर जशपुर के ऊँचे इलाकों यानी मनोरा, सन्ना, कुसमी और असता जैसे क्षेत्रों से शुरू हुआ था। जनवरी माह में इन पहाड़ी अंचलों में धूम मचाने के बाद, अब जतरा का कारवां ‘निच घाट’ के गांवों की ओर मुड़ चुका है। वर्तमान में दुलदुला और नारायणपुर से होते हुए मेला अपने निर्धारित गंतव्य की ओर बढ़ रहा है, जहाँ ग्रामीणों का भारी हुजूम उमड़ रहा है।

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परंपरा और आधुनिकता का संगम
जतरा मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा भी है। मेले में इस बार भी कई खास आकर्षण देखने को मिल रहे हैं:

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किसानों के लिए खेती-किसानी के औजार और घरों के लिए जरूरी साजो-सामान की दुकानों पर खासी भीड़ है। पारंपरिक मिठाइयां और स्थानीय व्यंजनों की खुशबू पूरे मेला परिसर में महक रही है। लकड़ी के पारंपरिक झूलों से लेकर आधुनिक बड़े झूलों तक, बच्चों और युवाओं में गजब का उत्साह देखा जा रहा है।

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उमंग और उल्लास का माहौल
जहाँ-जहाँ जतरा का पड़ाव पड़ रहा है, उसके आसपास के गांवों में दिवाली जैसा माहौल है। फागुन की आहट ने इस उल्लास को दोगुना कर दिया है। लोगों का कहना है कि जतरा मेला हमारी पुरानी पहचान है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखता है।

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स्थानीय ग्रामीण कहते है कि “यह सिर्फ जतरा मेला नहीं, बल्कि अपनों से मिलने और अपनी संस्कृति को जीने का एक माध्यम है।”फागुन की रंगीनी और जतरा की यह उमंग आने वाले दिनों में और भी परवान चढ़ेगी।

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मेले की जान: चूड़ी, बिंदी और बांसुरी की तान

जतरा मेले का असली रंग तो उन छोटी दुकानों में निखरता है, जहाँ गाँव की सादगी और खुशियाँ बिकती हैं। मेले के गलियारों में घूमते ही बांसुरी की सुरीली धुन कानों में मिश्री घोल देती है। यहाँ ग्रामीण महिलाओं के लिए रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियाँ और बिंदी के ढेरों स्टॉल लगे हैं, जहाँ वे बड़े चाव से खरीदारी कर रही हैं।

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बच्चों के लिए तो यह किसी स्वर्ग से कम नहीं है। मेले में चारों ओर उड़ते रंग-बिरंगे फुग्गे (गुब्बारे) और तरह-तरह के वाद्य यंत्रों (बाजे-खिलौने) का शोर, उत्सव के माहौल को और भी जीवंत बना रहा है। ये छोटी-छोटी चीजें ही हैं जो जतरा मेले को केवल एक बाजार नहीं, बल्कि यादों का एक पिटारा बना देती हैं।

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महंगाई पर भारी आस्था: परंपरा निभाने जतरा उमड़ रहे ग्रामीण

बदलते दौर और बढ़ती महंगाई ने भले ही आम आदमी की कमर तोड़ दी हो, लेकिन जब बात परंपराओं के निर्वहन की आती है, तो जशपुरिया संस्कृति के आगे सब फीका पड़ जाता है। जतरा मेले में उमड़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण आज भी अपनी जड़ों और पुरखों की विरासत को सहेजने के लिए महंगाई की चिंता छोड़कर मेले का हिस्सा बन रहे हैं।

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​बांसुरी की तान और चूड़ियों की खनक

​मेले के बाजार में इस बार भी वही पुरानी रौनक देखने को मिल रही है।
​ महिलाओं के लिए रंग-बिरंगी चूड़ियाँ और बिंदियों, मेकअप के सामान के स्टॉल सजे हैं। बच्चों के लिए फुग्गे (गुब्बारे) और खिलौना वाद्य यंत्र मेले के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। बाँसुरी बेचने वालों की सुरीली धुन से पूरा मेला परिसर गुंजायमान है।

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​साधन कम, पर उत्साह अपार
​ग्रामीणों का कहना है कि सामान की कीमतें भले ही बढ़ गई हों, लेकिन साल भर इस मेले का इंतजार रहता है। खेती-किसानी के लिए औजार हों या घर की जरूरत का छोटा-मोटा सामान, जतरा से खरीदी करना यहाँ की परंपरा का हिस्सा है। फागुन के इस मेले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उल्लास और उमंग का कोई मोल नहीं होता।

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युवतियों और महिलाओं में खासा आकर्षण

​जतरा मेला केवल खरीदारी का केंद्र नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए सामाजिक मिलन और अपनी पसंद को सहेजने का एक बड़ा जरिया है। मेले में पहुँचते ही महिलाओं और लड़कियों का सबसे बड़ा हुजूम श्रृंगार की दुकानों पर नजर आता है।

​सज धज कर पहुँच रही टोलियाँ:
गाँव की युवतियाँ और महिलाएँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर टोलियों में मेले का आनंद लेने पहुँच रही हैं।रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियाँ, चमकीली बिंदियाँ, गहने और आधुनिक सौंदर्य सामग्री (कॉस्मेटिक्स) के स्टॉल्स पर सबसे ज्यादा भीड़ देखी जा रही है।

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नई उम्र की लड़कियों में मेले के बीच बांसुरी की तान और सजे-धजे झूलों के साथ फोटो खिंचवाने और यादें सहेजने का जबरदस्त क्रेज नजर आता है।

​महंगाई के बावजूद, महिलाएं अपने घर के बजट से थोड़ा हिस्सा बचाकर इन छोटी-छोटी खुशियों को खरीदने और अपनी परंपरा का मान रखने में पीछे नहीं हैं।

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