केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट Informationen सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट जारी कर दी है। इस विस्तृत रिपोर्ट में देशभर के स्कूलों में शिक्षक भर्ती, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, छात्र नामांकन और बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर अभूतपूर्व प्रगति देखने को मिली है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के लागू होने के बाद आए इन ढांचागत सुधारों से स्पष्ट है कि भारतीय स्कूली शिक्षा का स्तर अब वैश्विक मानकों के अनुरूप तेजी से मजबूत हो रहा है।
छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) में ऐतिहासिक प्रगति, NEP के राष्ट्रीय मानकों को पछाड़ा
इस रिपोर्ट का सबसे मजबूत और व्यावहारिक पहलू यह है कि देश का औसत छात्र-शिक्षक अनुपात यानी प्यूपिल-टीचर रेशियो (PTR) अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा निर्धारित 30:1 (प्रति तीस छात्रों पर एक शिक्षक) के आदर्श मानक से भी कहीं बेहतर स्थिति में पहुंच चुका है। स्कूलों में शिक्षकों की संख्या बढ़ने से अब हर स्तर पर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है। स्कूली शिक्षा के अलग-अलग चरणों के विस्तृत आंकड़ों को देखें, तो फाउंडेशनल स्तर पर स्थिति सबसे शानदार है, जहाँ प्रति 10 छात्रों पर 1 शिक्षक उपलब्ध है। इसके बाद प्रिपरेटरी स्तर पर छात्र-शिक्षक का अनुपात 12:1 दर्ज किया गया है, जो बच्चों के बुनियादी विकास के लिए आदर्श है। मिडिल स्कूल की ओर बढ़ने पर यह अनुपात 17:1 है, जबकि सेकेंडरी स्तर पर प्रति 21 छात्रों पर 1 शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहा है। शिक्षकों की इस पर्याप्त उपलब्धता के कारण कक्षाओं में बच्चों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है, जिससे पढ़ाई का स्तर सुधरा है।
शिक्षकों की इस फौज में महिला शिक्षिकाओं की बढ़ती भागीदारी रिपोर्ट का एक और सबसे महत्वपूर्ण और सामाजिक पहलू है। वर्ष 2025-26 में देश के भीतर शिक्षकों की कुल संख्या बढ़कर 1,02,73,020 हो गई है, जो वर्ष 2022-23 की तुलना में 8.3 प्रतिशत का बड़ा उछाल दर्शाती है। इस कुल संख्या में से अब महिला शिक्षकों की हिस्सेदारी बढ़कर 54.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि महिला शिक्षकों के इस बढ़ते प्रतिनिधित्व से स्कूलों के भीतर बच्चों के लिए अधिक समावेशी, सुरक्षित और संवेदनशील शिक्षण वातावरण तैयार हो रहा है, जो विशेषकर छात्राओं के आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक होगा।
शिक्षकों की बढ़ती संख्या और बेहतर छात्र-शिक्षक अनुपात का सीधा और सकारात्मक असर अब विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखने पर भी साफ दिखाई दे रहा है। लंबे समय से देश के लिए चुनौती बने ड्रॉपआउट रेट में इस वर्ष बड़ी गिरावट आई है, जिसके तहत माध्यमिक स्तर पर छात्रों के स्कूल छोड़ने की दर पिछले वर्ष के 8.2 प्रतिशत से घटकर अब केवल 7 प्रतिशत रह गई है। इसके साथ ही नए दाखिलों में भी तेजी आई है और सेकेंडरी स्तर पर ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) पिछले वर्ष के 68.5 प्रतिशत से बढ़कर अब 71.7 प्रतिशत हो गया है। स्कूल में टिके रहने की दर यानी रिटेंशन रेट भी 47.2 प्रतिशत से एक लंबी छलांग लगाकर 51.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जिसका मतलब है कि अब आधे से अधिक बच्चे अपनी माध्यमिक शिक्षा को बीच में छोड़े बिना पूरा कर रहे हैं। साथ ही, फाउंडेशनल से प्रिपरेटरी स्तर पर जाने वाले बच्चों की संक्रमण दर रिकॉर्ड 99.2 प्रतिशत और मिडिल से सेकेंडरी स्तर पर यह दर 88.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है। शिक्षा मंत्रालय ने इस पूरे क्रांतिकारी बदलाव का सबसे प्रमुख कारण देश भर में माध्यमिक स्तर के स्कूलों की संख्या में हुई वृद्धि और उनकी आसान उपलब्धता को बताया है, जिससे अब बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए दूर नहीं जाना पड़ता।

