हमारी धरती का इतिहास करोड़ों साल पुराना है, और इसके गर्भ में ऐसे कई राज दफन हैं जो भविष्य की जलवायु को समझने में हमारी मदद कर सकते हैं। हाल ही में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ही बड़ी कामयाबी हासिल की है। शोधकर्ताओं को लगभग 25 करोड़ साल पहले के प्राचीन ‘गोंडवाना’ काल के जंगलों में लगी भीषण आग के पुख्ता सबूत मिले हैं। कोयले के भीतर छिपे इन आणविक (molecular) सबूतों से यह पता चलता है कि उस दौर की जंगलों की आग ने पृथ्वी की जलवायु, पेड़-पौधों और कोयला बनने की प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित किया था। भारत के इतिहास में पर्मियन काल (Permian period) की जंगली आग का यह अब तक का पहला और सबसे ठोस प्रमाण है।
पुरानी तकनीक की कमियों को किया दूर
अब तक वैज्ञानिक प्राचीन काल में लगी आग का अध्ययन करने के लिए मुख्य रूप से साधारण माइक्रोस्कोप (सूक्ष्मदर्शी) पर निर्भर रहते थे। इस तकनीक से कोयले और चट्टानों में मौजूद सूक्ष्म चारकोल (कोयले के बारीक कणों) को देखा तो जा सकता था, लेकिन यह साफ-साफ पता नहीं चल पाता था कि ये कण सचमुच आग से ही बने हैं या किसी अन्य प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया की वजह से। इस वजह से प्राचीन पर्यावरण को सटीक रूप से समझना एक बड़ी चुनौती थी।
इस कमी को दूर करने के लिए भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत आने वाले ‘बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज’ (BSIP) के वैज्ञानिकों ने एक नया रास्ता निकाला। वैज्ञानिकों की टीम (नेहा अग्रवाल, शिवली श्रीवास्तव और रंसी पॉल मैथ्यूज) ने चट्टानों के अध्ययन के साथ-साथ दो बेहद आधुनिक तकनीकों—’रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी’ और ‘एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी’ का एक साथ इस्तेमाल किया। इस एडवांस तरीके की मदद से वैज्ञानिकों ने भारत की गोदावरी घाटी कोयला क्षेत्र से मिले सैंपल्स की बारीकी से जांच की।
आग की तीव्रता का भी चला पता
इस आधुनिक तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि वैज्ञानिक न सिर्फ प्राचीन आग की पहचान कर पाए, बल्कि वे यह भी जान सके कि वह आग कितनी भयानक थी। वैज्ञानिकों ने कोयले के कणों की बनावट और उनके भीतर मौजूद रसायनों के आधार पर ‘तेज तीव्रता वाली आग’ (हाई-इंटेंसिटी) और ‘धीमी तीव्रता वाली आग’ (लो-इंटेंसिटी) के बीच के अंतर को साफ तौर पर ढूंढ निकाला। आग के कारण इन कणों में जो रासायनिक बदलाव हुए थे, उन्हें वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर और ग्राफ की मदद से पूरी तरह डिकोड कर लिया है।
भविष्य के लिए क्यों जरूरी है यह खोज?
विश्व प्रसिद्ध ‘जियोलॉजिकल जर्नल’ में प्रकाशित यह खोज आने वाले समय के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाली है। इस रिसर्च की मदद से वैज्ञानिक धरती पर करोड़ों सालों के दौरान हुए जलवायु परिवर्तनों (Climate Change) का एक बेहद सटीक मॉडल तैयार कर सकेंगे। सबसे खास बात यह है कि आज के दौर में जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, जंगलों में आग लगने (Forest Fires) की घटनाएं भी आम होती जा रही हैं। ऐसे में 25 करोड़ साल पुराने इन सुरागों की मदद से वैज्ञानिक यह अनुमान लगा सकेंगे कि भविष्य में बदलते मौसम के कारण हमारा ईको-सिस्टम और जंगल किस तरह व्यवहार करेंगे।

