HIGHLIGHT
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धर्म और समुदाय से परे सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार में एक समान कानून लागू करना।
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विवाह की न्यूनतम आयु समान होगी, विवाह का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होगा, बहुविवाह पर रोक लगेगी और केवल कानूनी प्रक्रिया से ही तलाक संभव होगा।
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पैतृक और स्व-अर्जित दोनों प्रकार की संपत्ति में बेटे और बेटी को 100% बराबर अधिकार का प्रावधान।
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बिना धार्मिक रुकावट के सभी नागरिकों को बच्चा कानूनी रूप से गोद लेने का समान हक मिलेगा।
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रिश्तों में दोनों पक्षों के कानूनी अधिकारों और सुरक्षा के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन का प्रस्ताव।
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महिलाओं को भरण-पोषण व जायदाद में बराबरी, बाल विवाह पर रोक, कानूनी प्रक्रियाओं का सरलीकरण और ‘एक देश, एक कानून’ की व्यवस्था।
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संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) पर प्रभाव की आशंका और जनजातीय (आदिवासी) पारंपरिक रूढ़ियों के संरक्षण को लेकर सवाल।
समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) देश के सबसे बड़े और बहुचर्चित विषयों में से एक बना हुआ है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में इसका उल्लेख किया गया है। इसका सीधा और सरल अर्थ यह है कि देश में रहने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति बंटवारे, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों (Personal Laws) में धर्म या समुदाय से परे एक समान कानून लागू हो। वर्तमान में पूरे देश के स्तर पर कोई एक केंद्रीय यूसीसी कानून लागू नहीं है, जिसके चलते अलग-अलग राज्यों में इसे लेकर अपने-अपने मसौदे और नीतियां सामने आ रही हैं।
यूसीसी लागू होने से पारिवारिक और सामाजिक जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियमों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। विवाह के मामले में सभी धर्मों के लिए लड़के और लड़की की न्यूनतम वैवाहिक आयु एक समान तय की जा सकती है, विवाह का कानूनी पंजीकरण अनिवार्य हो सकता है और बहुविवाह (Polygamy) की प्रथा पर पूरी तरह रोक लग सकती है। इसी तरह तलाक के मामलों में किसी भी धर्म विशेष की एकतरफा या त्वरित तलाक की परंपराओं को समाप्त कर केवल अदालत के जरिए एक तय कानूनी प्रक्रिया को अनिवार्य बनाया जा सकता है।
संपत्ति और उत्तराधिकार के मामले में यूसीसी सबसे बड़ा सामाजिक बदलाव ला सकता है। इसके प्रभावी होने से पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति में बेटे और बेटी दोनों को बराबर का कानूनी अधिकार मिलेगा, जिससे महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा बढ़ेगी। इसके अलावा, किसी भी अनाथ या जरूरतमंद बच्चे को गोद लेने के अधिकार सभी नागरिकों के लिए समान होंगे, जिसमें धर्म या पर्सनल लॉ की बाध्यता आड़े नहीं आएगी। हालिया मॉडलों के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप को भी एक औपचारिक दायरे में लाकर पंजीकरण अनिवार्य किया जा सकता है, जिससे दोनों पक्षों के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा हो सके।
इसके फायदों की बात करें तो यूसीसी का सबसे बड़ा पक्ष लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण से जुड़ा है। पर्सनल लॉ में मौजूद असमानताओं को खत्म कर महिलाओं को भरण-पोषण, गुजारा भत्ता और पैतृक जायदाद में बराबरी का दर्जा मिलेगा। इसके अलावा, देश की जटिल कानूनी प्रक्रिया सरल होगी, अदालतों में लंबित मुकदमों का बोझ घटेगा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथाओं पर कानूनी रूप से पूर्ण विराम लगेगा। यह व्यवस्था ‘एक देश, एक कानून’ की भावना को सुदृढ़ कर नागरिक पहचान को प्राथमिकता देती है।
दूसरी ओर, यूसीसी को लेकर कई आपत्तियां और चिंताएं भी लगातार उठाई जा रही हैं। आलोचकों और कई धार्मिक संगठनों का तर्क है कि इससे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाले धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार और सदियों पुरानी परंपराओं पर असर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, भारत के विभिन्न राज्यों, विशेषकर पूर्वोत्तर और मध्य भारत की जनजातियों (Tribals) के अपने पारंपरिक व रूढ़िगत नियम हैं, जिनके संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। भारत जैसे सांस्कृतिक और भाषाई विविधता वाले देश में बिना सर्वसम्मति के सभी वर्गों पर एक समान नियम लागू करना प्रशासनिक और सामाजिक रूप से एक अत्यंत संवेदनशील चुनौती माना जाता है।























