रायपुर 22 मार्च 2026
आज जब पूरी दुनिया ‘विश्व जल दिवस’ मना रही है, छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों से लेकर वनांचलों तक पानी की स्थिति एक अत्यंत चिंताजनक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राजधानी रायपुर और औद्योगिक नगरी भिलाई जैसे क्षेत्रों में अनियंत्रित शहरीकरण और कंक्रीट के बढ़ते जाल ने भू-जल पुनर्भरण के प्राकृतिक रास्तों को लगभग बंद कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप रायपुर के कई घने बसे इलाके अब ‘डार्क ज़ोन’ की कगार पर पहुँच गए हैं। इन शहरों में स्थिति इतनी विकट है कि 400 से 500 फीट की गहराई पर भी बोरवेल जवाब दे रहे हैं, वहीं शिवनाथ और खारून जैसी जीवनदायिनी नदियाँ औद्योगिक प्रदूषण और अतिक्रमण की दोहरी मार झेल रही हैं। गरियाबंद और महासमुंद के नदी कछार क्षेत्रों में भी धान की खेती के लिए भू-जल का बेतहाशा दोहन हो रहा है, जिससे न केवल जल स्तर गिर रहा है बल्कि फ्लोराइड की बढ़ती मात्रा ने ग्रामीण स्वास्थ्य के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है।

न्यायधानी बिलासपुर की स्थिति भी इससे अलग नहीं है, जहाँ अर्पा नदी का अस्तित्व अब केवल मानसून के कुछ महीनों तक ही सीमित होकर रह गया है। शहर के भीतर गिरता जल स्तर गर्मी की शुरुआत में ही जल संकट का संकेत देने लगा है और अर्पा में बने बैराजों के बावजूद पानी की शुद्धता और उसका ठहराव एक बड़ा यक्ष प्रश्न बना हुआ है। दूसरी ओर, उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा और जशपुर जैसे पहाड़ी अंचलों में समस्या पानी की उपलब्धता की नहीं बल्कि उसके संचयन की है। ढलानी भौगोलिक संरचना के कारण बारिश का अधिकांश पानी बहकर नदियों में चला जाता है, जिससे जशपुर के बगीचा और मनोरा जैसे क्षेत्रों के पारंपरिक जल स्रोत ‘झरिया’ और ‘डोंगी’ गर्मियों में तेजी से सूखने लगते हैं। इन वनांचलों में रहने वाले ग्रामीणों को अपनी प्यास बुझाने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है, जो राज्य के जल प्रबंधन तंत्र की सीमाओं को उजागर करता है।
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छत्तीसगढ़ की ‘तालाबों वाली संस्कृति’ का लुप्त होना इस संकट का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। जो रायपुर शहर कभी अपने हज़ारों तालाबों के लिए विख्यात था, वह आज पूरी तरह से पाइपलाइन और टैंकरों की आपूर्ति पर निर्भर हो चुका है। जल विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि यदि समय रहते सरगुजा से लेकर गरियाबंद तक ‘नरवा विकास’ और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो आने वाले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ को एक भीषण ‘वॉटर इमरजेंसी’ का सामना करना पड़ सकता है। आज का यह दिन केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि लुप्त होती नदियों और सूखते भू-जल को बचाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य करने का संकल्प लेने का है।

