गरीबी की तल्ख हकीकत और चंद पैसों की वेदी पर बलि चढ़ता एक इंसान
जशपुर के दूरस्थ और बीहड़ वनांचल कंदराई पाठ की सुबह उस दिन भी बाकी दिनों जैसी ही थी—मेहनत, मज़दूरी और दो वक्त की रोटी की तलाश। गाँव का ३० वर्षीय फगुआ राम कोरवा अपनी पत्नी के साथ सिर पर सूखी लकड़ियों का गट्ठा साधे, उम्मीद की एक डोर पकड़े सन्ना बाज़ार की तरफ़ बढ़ा था। उसे क्या पता था कि आज घर से निकलते वक्त अपनी चौखट पर जो कदम उसने बढ़ाए हैं, वे उसके जीवन के आखिरी कदम साबित होंगे।
उसी राह पर गाँव के ही दो और रिश्तेदार—५० साल का फगुआ राम कोरवा (ज्येष्ठ) और उसका २१ साल का बेटा बृजनाथ भी अपने कंधों पर लकड़ियों का बहिंगा (काँवर) टाँगे पेट की आग बुझाने सन्ना की ओर जा रहे थे। गरीबी एक ऐसा धागा है जो इन सभी को आपस में जोड़ता था, लेकिन इसी गरीबी की भयावहता ने उस शाम एक ऐसा मोड़ लिया जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया।
सन्ना पहुँचकर लकड़ियाँ बेचने के बाद, किसी स्थानीय व्यक्ति राजू ने उन बाप-बेटे से अपने मरे हुए बछड़े को दफनाने के लिए कहा। चंद रुपयों की आस में बाप-बेटे ने वह मज़दूरी कर ली। मेहनत के बदले हाथ में कुछ कड़कड़ाते नोट आए—शायद वे रुपये उनके लिए उस दिन के राशन या दो निवालों का सहारा बनने वाले थे।
पंचायत भवन के पास जब दोनों फगुआ राम आपस में मिले, तो बात उठी। मृतक फगुआ ने सहज ही उस कमाई में अपना हक या हिस्सा माँग लिया—शायद तंगहाली के उस दौर में उसे भी उन थोड़े से पैसों की सख्त ज़रूरत रही होगी। पर अभावों से उपजी खीझ, शराब के सुरूर और चंद रुपयों की हवस ने रिश्तों और इंसानियत के सारे तार-तार कर दिए। छोटी सी कहासुनी पल भर में जुनून बन गई।
जिस बहिंगा से वे सुबह रोटी की आस उठाकर लाए थे, वही काँवर और राह में पड़ा एक निर्दयी पत्थर उस दिन कातिल हथियार बन गया। पिता और पुत्र ने मिलकर अपनी ही बिरादरी के ३० साल के नौजवान फगुआ के सिर पर जानलेवा वार कर दिया।
कंदराई पाठ की वही माटी, जहाँ वे साथ खेले-बढ़े थे, फगुआ के खून से लाल हो गई। लहुलूहान और बेहोश फगुआ को जब एंबुलेंस में लादकर जशपुर अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब सायरन की चीखती आवाजों के बीच उसकी उखड़ती साँसों ने दम तोड़ दिया। अस्पताल का दरवाज़ा आने से पहले ही उसकी आँखें सदा के लिए मुँद गईं।
विडंबना की पराकाष्ठा तो देखिए— जिस गाँव में चंद रुपयों के विवाद ने एक हँसते-खेलते नौजवान को मौत की नींद सुला दिया, उसी गाँव के दो लोग अब सलाखों के पीछे अपनी आक्रामक भूल का पछतावा कर रहे हैं। पीछे छूट गई मृतक की बिलखती पत्नी, जिसका संसार सिर्फ उस सूखी लकड़ी के गट्ठे और अपने पति के साथ से चलता था।
सन्ना की उस शाम ने यह कड़वा सच बयां कर दिया कि जब गरीबी हद से गुज़र जाती है, तो चंद सिक्कों की खनक भी इंसानी खून से सस्ती हो जाती है।

