जगदलपुर (बस्तर):
जहां पूरे देश में दशहरा असत्य पर सत्य की विजय और रावण दहन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर में यह पर्व बिल्कुल अनूठे अंदाज में सदियों पुरानी जनजातीय परंपरा, देवी-देवताओं के संगम और जन-सरोकारों का उत्सव बनकर जीवंत होता है। विश्व का सबसे लंबा चलने वाला 75 दिनों का ऐतिहासिक ‘बस्तर दशहरा’ अब अपने सबसे महत्वपूर्ण और रोमांचक अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है।
आसपास के सैकड़ों वनांचल गांवों से ग्रामीण अपने ग्राम-देवताओं की डोलियों, लाठों और छत्रों के साथ जगदलपुर पहुंच चुके हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और जनजातीय आस्था के रंगों से पूरी दंडकारण्य धरा सराबोर हो उठी है।
अंतिम चरण की 5 ऐतिहासिक परंपराएं
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मावली परघाव (दो देवियों का भावुक मिलन):
मां मावली को बस्तर की अधिष्ठात्री कुलदेवी मां दंतेश्वरी की बहन माना जाता है। जब दंतेवाड़ा से मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी का छत्र जगदलपुर पहुंचता है, तो बस्तर राजपरिवार और हजारों सेवादार मोहरी, तुड़ही और ढोल-नगाड़ों की थाप पर उनकी भावुक अगवानी करते हैं।
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भीतर रैनी (विशाल रथ की प्रतीकात्मक ‘चोरी’):
उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण 8 पहियों वाला विशालकाय काष्ठ ‘विजय रथ’ होता है। भीतर रैनी की रात स्थानीय माड़िया और मुरिया जनजाति के लोग इस विशाल रथ को ‘चुराकर’ शहर से दूर कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले जाते हैं। यह परंपरा शासक के सामने प्रजा द्वारा अपनी स्वायत्तता, हक और अधिकार जताने का अनूठा तरीका है।
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बाहर रैनी (नवाखाई और मान-मनौव्वल):
रथ चोरी के अगले दिन बस्तर राजपरिवार के सदस्य कुम्हड़ाकोट के जंगलों में पहुंचते हैं। वहां वे ग्रामीणों के साथ बैठकर ‘नवाखाई’ (नए अन्न का भोग) ग्रहण करते हैं। इसके बाद मान-मनौव्वल कर ग्रामीणों से आदरपूर्वक रथ को पुनः शहर वापस लाने का आग्रह किया जाता है, जो राजा और प्रजा के बीच अटूट प्रेम को रेखांकित करता है।
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मुरिया दरबार (लोक-संसद का ऐतिहासिक मंच):
इस दिन बस्तर के मांझी, चालकी और ग्रामीण प्रतिनिधि पारंपरिक लोक-संसद में एक साथ बैठकर क्षेत्र के विकास, जन-समस्याओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर चर्चा करते हैं। इस बार के मुरिया दरबार की ऐतिहासिकता और बढ़ रही है, क्योंकि स्वयं देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु इस जन-संवाद में शामिल होकर आदिवासियों के विचार सुनेंगी।
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कुटुंब जात्रा (भावुक विदाई):
75 दिनों के महापर्व का समापन ‘कुटुंब जात्रा’ के साथ होता है। इस दिन बस्तर के कोने-कोने से पधारे सभी ग्राम देवी-देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना कर उन्हें सम्मानपूर्वक और भावभीनी विदाई के साथ उनके मूल गांवों के लिए रवाना किया जाता है।
महाष्टमी की मध्यरात्रि: ‘निशा जात्रा’ की गुप्त व रहस्यमयी पूजा
बस्तर दशहरा की परंपराओं में महाष्टमी की आधी रात को होने वाली ‘निशा जात्रा’ अत्यंत रहस्यमयी और तांत्रिक पद्धति से जुड़ी पूजा है।
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वर्ष में सिर्फ एक रात खुलता है मंदिर: अनुपमा चौक के समीप स्थित ऐतिहासिक ‘निशा जात्रा गुड़ी’ (खमेश्वरी गुड़ी) सालभर बंद रहती है और केवल इसी रात पूजा के लिए इसके पट खोले जाते हैं। मान्यता है कि इस गुड़ी में मां दंतेश्वरी और मां मानिकेश्वरी सहित समूचे बस्तर के देवी-देवताओं का वास रहता है।
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बलि विधान में ऐतिहासिक बदलाव: रियासतकाल में जहां इस रात हजारों भैंसों की बलि चढ़ाई जाती थी, वहीं समय के साथ जन-जागृति और कानूनों के बाद इसे सीमित कर दिया गया। अब केवल 11 बकरों की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। इसके अलावा माता मंदिर व राजमहल की सिंहड्योढ़ी में 2-2 तथा काली मंदिर में 1 बकरे की बलि का विधान है।
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सात्विक और अहिंसक परंपरा: परंपरा का दूसरा सुंदर पहलू यह है कि मां दंतेश्वरी मंदिर में काले कबूतर व मोंगरी मछली का प्रतीकात्मक उत्सर्ग होता है, जबकि राम मंदिर में उड़द दाल और रखिया कुम्हड़े (कद्दू) की पूर्णतः सात्विक बलि दी जाती है।
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22 मटकियों का महाप्रसाद: अनुष्ठान के दौरान बाघनपाल का पारंपरिक राजपुरोहित परिवार 11 कांवड़ यानी 22 मटकियों में चावल, दाल और खीर का विशेष भोग तैयार करता है, जिसे पूजा के बाद महाप्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।


