बिलासपुर (छत्तीसगढ़)।** मवेशियों की अवैध तस्करी और कत्लखानों तक ले जाने से जुड़े मामलों में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि पुलिस द्वारा जब्त किए गए कृषि उपयोगी पशुओं को मुकदमे (ट्रायल) की सुनवाई पूरी होने तक आरोपी, वाहन चालक या कथित मालिक को सुपुर्दनामे पर नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में जब्त मवेशियों को ट्रायल पूरा होने तक केवल पंजीकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान की अभिरक्षा (कस्टडी) में ही रखा जाएगा।
विशेष कानून के आगे सीआरपीसी के सामान्य प्रावधान प्रभावी नहीं
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि ‘छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004’ एक विशेष कानून (Special Law) है। धारा 7 और 18 के तहत इसमें स्पष्ट प्रावधान है कि जब्त पशु अंतिम निर्णय तक गौशालाओं या गोरक्षण संस्थानों में ही रहेंगे।
अदालत ने कहा कि यह विशेष कानून होने के कारण सामान्य आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के प्रावधानों पर प्रभावी रहेगा। इसलिए मजिस्ट्रेट सामान्य धाराओं का सहारा लेकर किसी आरोपी या कथित मालिक को पशु वापस नहीं सौंप सकते।
आरोपियों को मवेशी लौटाने से कानून का उद्देश्य होगा निष्प्रभावी
डिवीजन बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पशु तस्करी के आरोपियों को ही जब्त मवेशी वापस सौंप दिए जाएं, तो इस कानून का मूल उद्देश्य ही निष्प्रभावी और विफल हो जाएगा। यह कानून कृषि उपयोगी पशुओं की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बनाया गया है, और इसकी भावना के विपरीत कोई भी आदेश नहीं दिया जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला जशपुर जिले के मनोरा पुलिस चौकी क्षेत्र से जुड़ा है। पुलिस ने एक ट्रक (HR-55-Q-5980) को रोककर उसमें लदे 23 नर और 5 मादा भैंसों को जब्त किया था। जांच के दौरान यह पाया गया कि इन मवेशियों को अवैध रूप से छत्तीसगढ़ से झारखंड के कत्लखाने ले जाया जा रहा था।
मामले में झारखंड (गुमला) निवासी मो. वसीम कुरैशी ने खुद को मवेशियों का मालिक बताते हुए उन्हें सुपुर्दनामे पर लेने के लिए जशपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) की अदालत में आवेदन दिया था। सीजेएम कोर्ट और फिर उसके बाद सेशन कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया।
सिंगल बेंच से डिवीजन बेंच तक पहुँचा मामला
निचली अदालतों के आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान सिंगल बेंच ने ‘जलील अंसारी बनाम छत्तीसगढ़ शासन’ मामले में दिए गए पूर्व निर्णय पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस की और मामला डिवीजन (लार्जर) बेंच को रिफर कर दिया। अब डिवीजन बेंच ने इस पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करते हुए याचिका खारिज कर दी है।

