रावणभाटा मैदान में सजेगी 18वीं बैल दौड़ और सजावट प्रतियोगिता, संस्कृति मंत्री होंगे मुख्य अतिथि
रायपुर: छत्तीसगढ़ की समृद्ध कृषि जीवनशैली और लोक संस्कृति का प्रतीक पावन पर्व ‘पोला’ कल, 10 सितंबर को पूरे प्रदेश में पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। राजधानी रायपुर के ऐतिहासिक रावणभाटा दशहरा मैदान में कृष्ण मित्र फाउंडेशन के तत्वावधान में लगातार 18वें वर्ष भव्य बैल दौड़, बैल श्रृंगार प्रतियोगिता और किसान सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा है। सजे-धजे नंदी और बैलों की दमखम से भरी दौड़ इस पारंपरिक उत्सव का मुख्य आकर्षण रहेगी।
बैल दौड़ और सजावट प्रतियोगिता: विजेताओं को मिलेंगे नकद पुरस्कार
फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले किसानों और पशुपालकों के लिए नकद पुरस्कारों की व्यवस्था की गई है:
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बैल सजावट प्रतियोगिता:
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प्रथम पुरस्कार: ₹5,000
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द्वितीय पुरस्कार: ₹3,000
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तृतीय पुरस्कार: ₹2,000
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बैल दौड़ प्रतियोगिता:
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प्रथम पुरस्कार: ₹3,000
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द्वितीय पुरस्कार: ₹2,000
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तृतीय पुरस्कार: ₹1,500
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संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल होंगे मुख्य अतिथि
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल शिरकत करेंगे। आयोजक संस्था द्वारा उन्हें छत्तीसगढ़ी पारंपरिक खुमरी व जैकेट पहनाकर तथा लाठी और मोर पंख भेंट कर सम्मानित किया जाएगा। इसके साथ ही रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल, रायपुर दक्षिण विधायक सुनील सोनी और रायपुर ग्रामीण विधायक मोतीलाल साहू का भी नागरिक अभिनंदन किया जाएगा।
अन्न माता के गर्भधारण की मान्यता: क्यों नहीं जाते खेतों में?
पंडित चंद्रभूषण शुक्ला और पंडित मनोज शुक्ला के अनुसार, भाद्रपद अमावस्या को मनाए जाने वाले पोला पर्व का धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों महत्व है:
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गर्भ पूजन की परंपरा: पोला की पूर्व रात्रि गर्भ पूजन की परंपरा निभाई जाती है। मान्यता है कि इस समय धान के पौधों में ‘दूध’ भरने की प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे अन्न माता का गर्भधारण माना जाता है।
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खेतों में जाना वर्जित: धान की बालियों और पौधों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे, इसलिए पोला के दिन किसानों के खेतों में काम करने या हल चलाने पर पूरी तरह रोक रहती है।
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कुशोत्पाटिनी अमावस्या: इसे कुशग्रहणी अमावस्या भी कहा जाता है, जिस दिन वर्षभर के धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पवित्र कुश एकत्र करने का विधान है।
घरों में महकेंगे पारंपरिक पकवान, मिट्टी के बैलों से खेलेंगे बच्चे
पोला के दिन राज्यभर के घरों में छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू बिखरेगी। महिलाएं सुबह से ही गुड़हा चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खुरमी, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गुजिया और तसमई (खीर) जैसे ठेठ व्यंजन तैयार करेंगी। किसान सुबह बैलों को नहलाकर उनके सींगों को रंगेंगे, खुरों में तेल लगाएंगे और गले में घुंघरू-घंटियां बांधकर उनकी आरती उतारेंगे।
शाम के समय बच्चे मिट्टी और लकड़ी के बने ‘पोरा-बैलों’ और मिट्टी के छोटे बर्तनों (जांता-पोरा) से खेलेंगे, जबकि युवतियां मिट्टी के खिलौने ‘पोरा पटकने’ की रस्म निभाएंगी। गांवों में कबड्डी और खो-खो जैसे पारंपरिक खेलों के साथ यह पर्व सामूहिक भाईचारे और सांस्कृतिक धरोहर का अनुपम उत्सव बनेगा।























