कैंसर और अंग प्रत्यारोपण के मरीजों में कमजोर इम्यूनिटी के कारण फंगल इंफेक्शन गंभीर हो सकता है। जानें इसके लक्षण, कारण, जांच और बचाव के तरीके।
कमजोर इम्यूनिटी वाले मरीजों के लिए गंभीर खतरा
फंगल इंफेक्शन यानी फफूंद से होने वाला संक्रमण आमतौर पर स्वस्थ लोगों में गंभीर बीमारी का कारण नहीं बनता। लेकिन कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों और अंग प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांट) कराने वाले लोगों के लिए यह संक्रमण जानलेवा साबित हो सकता है। इसकी प्रमुख वजह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी का कमजोर होना है।
स्वस्थ व्यक्ति रोजाना सांस के जरिए वातावरण में मौजूद फफूंद के सूक्ष्म कणों के संपर्क में आ सकता है। सामान्य परिस्थितियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इनसे बचाव करती है। लेकिन कीमोथेरेपी, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट और इम्यूनिटी को दबाने वाली दवाओं के कारण शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता कम हो सकती है।
कैंसर के मरीजों में क्यों बढ़ता है फंगल इंफेक्शन का खतरा?
कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी बोन मैरो को प्रभावित कर सकती है। इससे न्यूट्रोफिल नामक सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या कम हो जाती है। ये कोशिकाएं संक्रमण से लड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं। इनकी कमी लंबे समय तक रहने पर गंभीर फंगल संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है।
वहीं, अंग प्रत्यारोपण के बाद मरीजों को शरीर द्वारा नए अंग को अस्वीकार करने से रोकने के लिए इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं दी जाती हैं। इन दवाओं से भी संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद ग्राफ्ट-वर्सेस-होस्ट डिजीज (GVHD) होने पर अतिरिक्त उपचार की जरूरत पड़ सकती है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है।
तीन प्रमुख फंगल संक्रमण बन सकते हैं परेशानी
1. एस्परजिलस (Aspergillus): यह फफूंद आमतौर पर सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचती है। कमजोर इम्यूनिटी वाले मरीजों में यह रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकती है और गंभीर स्थिति में मस्तिष्क सहित दूसरे अंगों तक संक्रमण फैल सकता है।
2. कैंडिडा (Candida): यह फफूंद सामान्य रूप से शरीर के कुछ हिस्सों, खासकर पाचन तंत्र में मौजूद हो सकती है। कीमोथेरेपी से मुंह और आंतों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचने पर यह रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकती है। सेंट्रल वेनस कैथेटर भी संक्रमण का संभावित स्रोत हो सकता है।
3. म्यूकोरमाइकोसिस (Mucormycosis): यह एक गंभीर फंगल संक्रमण है, जो नाक, साइनस, आंखों के आसपास के हिस्से, मस्तिष्क या फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है। अनियंत्रित डायबिटीज, गंभीर इम्यूनिटी की कमी और कुछ कैंसर संबंधी स्थितियों में इसका खतरा बढ़ सकता है।
फंगल इंफेक्शन की पहचान करना क्यों मुश्किल?
गंभीर फंगल संक्रमण की समय पर पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कई मामलों में सामान्य ब्लड कल्चर से संक्रमण का पता नहीं चलता। इसलिए डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार सीटी स्कैन, विशेष ब्लड टेस्ट और अन्य जांच की मदद लेते हैं।
एस्परजिलस संक्रमण की आशंका होने पर गैलेक्टोमैनन टेस्ट उपयोगी हो सकता है। बीटा-D-ग्लूकान टेस्ट कुछ प्रकार के फंगल संक्रमणों का संकेत दे सकता है, लेकिन यह सभी संक्रमणों की पहचान नहीं करता। म्यूकोरमाइकोसिस के लिए इमेजिंग और जरूरत पड़ने पर प्रभावित ऊतक की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि किसी उच्च जोखिम वाले मरीज में संक्रमण की आशंका अधिक हो और उसकी हालत गंभीर हो, तो जांच के नतीजों का इंतजार करते हुए इलाज में देरी करना खतरनाक हो सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर तुरंत उपचार शुरू करने का निर्णय ले सकते हैं।
बचाव और इलाज में किन बातों का रखें ध्यान?
गंभीर फंगल संक्रमण के इलाज के लिए डॉक्टर मरीज की स्थिति और संक्रमण के प्रकार के अनुसार एंटीफंगल दवाएं देते हैं। कुछ दवाएं ट्रांसप्लांट के बाद इस्तेमाल होने वाली टैक्रोलिमस जैसी दवाओं के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए दवाओं के स्तर, संभावित दुष्प्रभाव और जरूरत के अनुसार खुराक की निगरानी जरूरी होती है।
बचाव के लिए डॉक्टर कुछ उच्च जोखिम वाले मरीजों को एंटीफंगल दवाएं पहले से दे सकते हैं। इसके अलावा संक्रमण के शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना, अस्पताल में संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन करना और समय पर जांच कराना महत्वपूर्ण है।
कैंसर या ट्रांसप्लांट के मरीजों में बुखार, सांस लेने में परेशानी या तेजी से बिगड़ती तबीयत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें।
फंगल इंफेक्शन का खतरा केवल फफूंद की मौजूदगी पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मरीज की इम्यूनिटी और उसकी बीमारी की स्थिति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। कैंसर के इलाज या अंग प्रत्यारोपण के दौरान कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण सामान्य रूप से नियंत्रित रहने वाली फफूंद भी गंभीर संक्रमण पैदा कर सकती है। समय पर पहचान, उचित एंटीफंगल उपचार और डॉक्टरों की निगरानी से गंभीर जटिलताओं का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।


