विशेष ग्राउंड रिपोर्ट:
अश्विन मास की नवरात्रि और विजयादशमी के पावन अवसर पर जब समूचा देश मां दुर्गा के जयकारों, डांडिया की थाप और रावण दहन के उल्लास में डूबा रहता है, तब छोटानागपुर के घने जंगलों और पहाड़ों पर बसी एक आदिम बस्ती में सन्नाटा पसर जाता है। यहां न तो ढोल-नगाड़े बजते हैं और न ही घरों में पकवान बनते हैं। यह बस्ती है असुर जनजाति की, जिसके लिए दशहरा विजय का पर्व नहीं, बल्कि अपने महाप्रतापी राजा और पूर्वज महिषासुर के वध का गहरा शोक दिवस है।
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झारखंड के गुमला, लातेहार, लोहरदगा और छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के मनोरा विकासखंड (लुखी, जरहापाठ, बुर्जुपाठ, हाड़ीकोना और दौनापठा) की पहाड़ियों पर रहने वाले असुर समुदाय के लोग सदियों से इस अनूठी परंपरा को अपनी अस्मिता और गौरव के साथ संजोए हुए हैं।

“महिषासुर कोई दैत्य नहीं, हमारे पराक्रमी राजा थे”
मुख्यधारा की पौराणिक मान्यताओं में महिषासुर को एक राक्षस के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसका संहार देवी दुर्गा ने किया था। लेकिन असुर समुदाय का इतिहास और लोकगाथाएं इससे बिल्कुल अलग कहानी बयां करती हैं:
पितृपुरुष और धरती के राजा
असुर समाज महिषासुर को ‘हुदुड़ दुर्गा’ के नाम से पुकारता है। उनकी मान्यता है कि महिषासुर इस धरती के न्यायप्रिय, वीर और पराक्रमी राजा थे, जो उनके पूर्वज हैं।
समाज के बुजुर्गों का कहना है कि महिषासुर एक सच्चे योद्धा थे और वे महिलाओं पर कभी हथियार नहीं उठाते थे। इसी नीति का लाभ उठाकर देवताओं ने छलपूर्वक देवी दुर्गा के जरिए उनका वध करवाया।

नौ दिनों तक घर में मौन
इसी शोक के कारण नवरात्रि के पहले दिन से लेकर दशमी तक असुर समाज के लोग कोई भी मांगलिक कार्य नहीं करते। हाल के वर्षों तक दशहरे के दिन कोई भी व्यक्ति घर की दहलीज तक नहीं लांघता था।
दशहरा पर शोक, तो दीवाली पर अनोखे अनुष्ठान
असुर समुदाय मूर्ति पूजक नहीं है, बल्कि वह मूलतः प्रकृति, मवेशी और अपने पुरखों की आराधना करता है। दशहरे के मातम के बाद जब दीपावली आती है, तो इनके घरों में एक अलग ही पारंपरिक अनुष्ठान देखने को मिलता है

आढ़ा-बूढ़ा परंपरा
दिवाली के दिन किसी भी देवी-देवता की पूजा से पहले घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति को पाटे पर बैठाकर उनकी विधिवत पूजा की जाती है और पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। मान्यता है कि घने जंगलों में शिकार के दौरान रास्ता भटकने या हिंसक जीवों के खतरे से बुजुर्गों का आशीष ही उनकी रक्षा करता है।
मिट्टी का पिंड बनाकर पुरखों का स्मरण
दीपावली की रात आंगन में मिट्टी का एक छोटा पिंड बनाया जाता है, जिसे महिषासुर और अपने पुरखों का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।
मवेशियों को जीवन और आजीविका की रीढ़ मानने वाले असुर लोग दिवाली की सुबह गाय-बैलों को नहलाते हैं, अरंडी की टहनियां खिलाते हैं और रात को करंज के तेल का दीया जलाकर मवेशियों के सींगों पर तेल लगाते हैं।

12 साल में भैंसासुर की पूजा
महिषासुर की सवारी भैंसा (काड़ा) के प्रति आस्था व्यक्त करने के लिए हर 12 वर्ष में एक बार गुमला के बिशुनपुर, डुमरी और लातेहार के महुआडांड़ में विशाल स्तर पर भैंसे की पूजा और मेला आयोजित होता है।
सिंधु घाटी और लौह युग से जुड़ा गौरवशाली इतिहास
मानव विज्ञानियों और इतिहासकारों के शोध असुर जनजाति के ऐतिहासिक महत्व की गवाही देते हैं:
: मानव विज्ञानियों ने असुरों को प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड समूह में रखा है। प्रसिद्ध नृतत्वशास्त्री एस.सी. राय और पुरातत्वविदों के अनुसार, असुरों का संबंध हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सिंधु सभ्यता से रहा है। वे भारत में कच्ची मिट्टी और पत्थरों से लोहा गलाने की प्राचीनतम कला के जनक माने जाते हैं।
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टांगीनाथ धाम का रहस्य
गुमला के डुमरी स्थित ऐतिहासिक टांगीनाथ धाम में गड़ा सदियों पुराना विशाल त्रिशूल आज भी जंग से मुक्त है। असुर समुदाय इसे अपने राजा महिषासुर का अस्त्र मानता है, जिसे उनके पूर्वजों ने धातु पिघलाकर तैयार किया था।
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ऋग्वेद, उपनिषद्, महाभारत और मुंडा लोकगाथा ‘सोसोबोंगा’ में असुरों की शक्ति और शिल्प का व्यापक वर्णन मिलता है।
उपेक्षा, पलायन और विलुप्त होती भाषा का संकट
गौरवशाली इतिहास और समृद्ध परंपराओं के बावजूद आज यह विशेष संरक्षित आदिम जनजाति (PVTG) अपने अस्तित्व की गंभीर लड़ाई लड़ रही है:

अशिक्षा और सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण इस समुदाय को लंबे समय तक भेदभाव झेलना पड़ा। जमीनों के पक्के रिकॉर्ड न होने के कारण नई पीढ़ी को जाति और निवास प्रमाण पत्र बनवाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
विलुप्त होती ‘असुर’ भाषा आधुनिकता और शिक्षा के अभाव में इनकी मूल असुर भाषा लगभग दम तोड़ चुकी है। जशपुर के गांवों में अब 95 वर्षीया मडवारी बाई और 70 वर्षीया चिरमईत बाई जैसी गिनी-चुनी बुजुर्ग महिलाएं ही बची हैं, जो इस भाषा को पूरी तरह बोल पाती हैं।
रोजी-रोटी की तलाश में पलायन जंगलों और लौह शिल्प पर निर्भर रहने वाले इस समाज के युवा अब रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
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पहाड़ के ऊपर अपने आराध्य महिषासुर की स्मृति में शांत बैठा असुर समुदाय और नीचे बजते दुर्गा पूजा के पंडाल—यह विरोधाभास भारत के उस बहुसांस्कृतिक ताने-बाने को उजागर करता है, जहां आस्था की धाराएं अलग-अलग स्मृतियों से निकलकर एक ही धरती पर सदियों से सह-अस्तित्व के साथ बह रही हैं।


