बिलासपुर:
स्थायी जाति प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही कोरिया जिले की एक युवती को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। पिता और भाई का स्थायी जाति प्रमाणपत्र पहले से बने होने के बावजूद अधिकारी द्वारा 1950 से पहले के दस्तावेज मांगकर टरकाने के मामले में अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने भरतपुर के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व/SDM) को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता के लंबित आवेदन पर ‘छत्तीसगढ़ सामाजिक प्रास्थिति प्रमाणन का विनियमन अधिनियम, 2013’ के प्रावधानों के तहत छह महीने के भीतर विधिवत निर्णय लें।
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कोरिया जिले के जनकपुर निवासी दुर्गावती भारती ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर राजस्व अधिकारियों की कार्यप्रणाली को चुनौती दी थी।
पिता-भाई के पास पहले से वैध प्रमाणपत्र: याचिकाकर्ता ने एसडीएम भरतपुर के समक्ष स्थायी जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। उसने बताया कि उसके पिता और सगे भाई को सक्षम प्राधिकारी द्वारा पहले ही स्थायी जाति प्रमाणपत्र जारी किया जा चुका है।
1950 के पुराने रिकॉर्ड की मांग: इसके बावजूद राजस्व अधिकारियों ने आवेदन का निराकरण करने के बजाय मौखिक रूप से असमर्थता जताई। अधिकारी इस बात पर अड़े रहे कि जब तक 1950 से पहले का रिकॉर्ड पेश नहीं किया जाएगा, तब तक प्रमाणपत्र जारी नहीं होगा।
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दस्तावेज न होने पर ‘असमर्थता प्रमाणपत्र’ देने की छूट
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से उप महाधिवक्ता धर्मेश श्रीवास्तव ने पक्ष रखते हुए कहा कि राज्य सरकार ने 2013 में सामाजिक प्रास्थिति प्रमाणपत्र जारी करने के लिए बाकायदा कानून बनाया है, और उसी में निर्धारित प्रक्रिया के तहत लंबित आवेदनों का समय पर निराकरण होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने मामले में स्पष्ट व्यवस्था देते हुए कहा: सक्षम प्राधिकारी कानून में तय प्रावधानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निष्पक्ष निर्णय लें। यदि याचिकाकर्ता के पास 1950 से जुड़े पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, तो उसे दस्तावेजों की अनुपलब्धता का ‘असमर्थता प्रमाणपत्र’ (Inability Certificate) प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। इसके बाद अधिकारी उपलब्ध दस्तावेजों, पारिवारिक प्रमाणपत्रों और वैधानिक प्रक्रिया के आधार पर पात्रता का निर्धारण करें।
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एसडीएम को 6 महीने की डेडलाइन
हाईकोर्ट ने भरतपुर एसडीएम को निर्देश दिया है कि वे अदालत के आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह माह की समय-सीमा के भीतर दुर्गावती के आवेदन पर अंतिम और विधिवत आदेश पारित करें। इस निर्देश के साथ अदालत ने याचिका का अंतिम निराकरण कर दिया। कोर्ट के इस फैसले से उन हजारों युवाओं को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके जाति प्रमाणपत्र पुराने राजस्व दस्तावेजों के अभाव में अटके पड़े हैं।























