सड़कों की बदहाली पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सख्त: NHAI और नगर निगम को लगाई फटकार, कहा— ‘सड़कें दुरुस्त रखना सरकार का काम, कोर्ट का नहीं’
बिलासपुर:
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजनांदगांव निवासी दिवंगत सरकारी कर्मचारी सुखीदास कुर्रे की संपत्ति और सेवा लाभों को लेकर चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी की मृत्यु के समय दोनों में से किसी भी महिला को ‘वैध पत्नी’ का दर्जा नहीं दिया जा सकता। हालांकि, अदालत ने राहत देते हुए व्यवस्था दी कि दोनों महिलाओं से जन्मे सुखीदास के तीनों बच्चों को उनकी जमीन, मकान सहित समस्त अचल संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलेगा।

वहीं, दिवंगत कर्मचारी के वेतन, पेंशन, जीपीएफ (GPF) और ग्रेच्युटी सहित करीब ₹17 लाख के सेवा संबंधी लाभों के लिए पक्षों को सक्षम न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate) प्राप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए दोनों पक्षों की अपीलों का निराकरण कर दिया।
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क्या था पूरा विवाद?
पशु चिकित्सा विभाग में सहायक क्षेत्र अधिकारी के पद पर पदस्थ सुखीदास कुर्रे की 12 अगस्त 2015 को मृत्यु हो गई थी:
पहली महिला शोभा साहू से उनका एक पुत्र अविनाश है, जबकि दूसरी महिला अशोक लता कुर्रे से दो पुत्रियां (लक्ष्मी और बेबी उर्फ दीपिका) हैं।अशोक लता पक्ष का दावा था कि शोभा ने 10 जुलाई 2000 को आपसी सहमतिनामे के जरिए सुखीदास से अलग होकर अरुण साहू से पुनर्विवाह कर लिया था।दूसरी ओर, शोभा का तर्क था कि पहले विवाह का विधिवत कानूनी तलाक नहीं हुआ था। साथ ही यह तथ्य भी सामने आया कि अशोक लता का भी अपने पूर्व पति धनेश कोसले से कानूनी रूप से विवाह विच्छेद नहीं हुआ था।
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सेवा अभिलेख और पूर्व विवाह बने निर्णय का मुख्य आधार
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद दोनों महिलाओं की वैवाहिक स्थिति को अमान्य ठहराया:
शोभा के स्वयं के सेवा अभिलेखों (सर्विस बुक) में अरुण साहू का नाम पति के रूप में दर्ज था, उनकी तस्वीर लगी थी और उन्हें ही सेवा लाभों के लिए नामांकित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जब शोभा ने सहमतिनामे के आधार पर अन्य व्यक्ति से वैवाहिक संबंध स्वीकार कर लिए, तो वे संपत्ति दावा करते समय उसी दस्तावेज के प्रभाव को नकार नहीं सकतीं।अशोक लता का पूर्व पति से कानूनी तलाक न होने के कारण सुखीदास के साथ उनका विवाह भी कानूनन वैध नहीं माना जा सकता।
इन कानूनी पहलुओं के आधार पर खंडपीठ ने माना कि सुखीदास की मृत्यु की तिथि पर दोनों में से कोई भी महिला वैध पत्नी नहीं थी।
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तीनों संतानों का अचल संपत्ति में समान अधिकार
अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक स्थिति का विवाद संतानों के कानूनी अधिकारों को समाप्त नहीं करता:अविनाश, लक्ष्मी और बेबी उर्फ दीपिका—तीनों ही सुखीदास की जैविक संतान हैं और इस तथ्य पर दोनों पक्षों में कोई विवाद नहीं था।हिंदू उत्तराधिकार कानून के सिद्धांतों के तहत, तीनों संतानों को अपने पिता सुखीदास की अचल संपत्ति (मकान, जमीन आदि) में एक तिहाई (1/3) बराबर हिस्सा मिलेगा। किसी भी एक पक्ष का संपूर्ण संपत्ति पर एकाधिकार का दावा खारिज कर दिया गया।
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₹17 लाख के सेवा परिलाभों के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र अनिवार्य
सुखीदास के बकाया वेतन, पेंशन, भविष्य निधि और ग्रेच्युटी से जुड़े करीब ₹17 लाख के सेवा परिलाभों पर कोर्ट ने प्रक्रियागत स्पष्टता दी:
अदालत ने कहा कि इस राशि के आहरण के लिए केवल स्वत्व (अधिकार) की घोषणा पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उचित अनुतोष मांगना और निर्धारित न्यायालय शुल्क (कोर्ट फीस) चुकाना अनिवार्य है।ट्रायल कोर्ट द्वारा सेवा लाभों पर अधिकार घोषित करने के आदेश को निरस्त करते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि संबंधित पक्ष भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (भाग-10) के तहत सक्षम न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करें।सक्षम अदालत से प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए जाने के बाद संबंधित विभाग सेवा नियमों के तहत भुगतान की प्रक्रिया पूरी करेगा।
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