जशपुर, 26 मई 2026
छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला इन दिनों बागवानी (हॉर्टिकल्चर) के क्षेत्र में एक नई और मीठी इबारत लिख रहा है। पारंपरिक खेती के बदले फलदार फसलों को दिए जा रहे बढ़ावा का असर अब जमीन पर साफ दिखने लगा है। इसी कड़ी में जशपुर का सन्ना और करडीह क्षेत्र एक बड़े ‘नाशपाती हब’ के रूप में उभर रहा है, जो स्थानीय किसानों के जीवन यापन और आर्थिक सुदृढ़ता का सबसे मजबूत जरिया बन चुका है।
जशपुर के सन्ना और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में नाशपाती की इस बंपर पैदावार के पीछे यहाँ की अनूठी भौगोलिक स्थिति और बेहद अनुकूल जलवायु है। समुद्र तल से अधिक ऊंचाई पर होने के कारण यहाँ का तापमान मैदानी भागों की तुलना में काफी कम रहता है, जिससे नाशपाती के पौधों को जरूरी ठंडक प्राकृतिक रूप से मिल जाती है। इसके साथ ही यहाँ की हल्की अम्लीय और नमी सोखने वाली लाल-पीली दोमट मिट्टी इस फल के पौधों के विकास और जड़ों की मजबूती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। इसी प्राकृतिक वरदान और मिट्टी की खूबी के कारण यहाँ की नाशपाती देश के अन्य पारंपरिक क्षेत्रों, जैसे हिमाचल या जम्मू-कश्मीर की तुलना में थोड़ी पहले तैयार हो जाती है। अगेती फसल होने के कारण जशपुर के किसानों को बाजार की शुरुआत में ही बेहद ऊंचे और प्रीमियम दाम मिल जाते हैं, जिससे उन्हें तगड़ा मुनाफा होता है।
इस प्राकृतिक अनुकूलता के बीच अंधाधुंध पारंपरिक खेती को छोड़कर आधुनिक बागवानी की तरफ किसानों की बढ़ती रुचि ने सफलता की कहानी को और मुकम्मल बना दिया है। करडीह पंचायत के ग्राम केराकोना के प्रगतिशील किसान श्री अनिल एक्का इस बदलाव की एक जीती-जागती मिसाल हैं। उन्होंने अपनी 4 से 5 एकड़ की निजी भूमि पर शासन की कल्याणकारी योजना और नाबार्ड के सहयोग से बड़े पैमाने पर नाशपाती की खेती शुरू की। नाबार्ड ने उनके खेत में कुआं और मोटर पंप जैसी सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराईं, जिससे पानी की चिंता दूर हो गई। इसके साथ ही कृषि वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले मिट्टी परीक्षण और आधुनिक उपायों से फसल की गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। वैज्ञानिक देखरेख और सही प्रबंधन के चलते अब यहाँ हर साल पैदावार का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है।
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स्वाद के मामले में भी जशपुरिया नाशपाती का कोई सानी नहीं है। यहाँ पैदा होने वाला फल अत्यधिक रसीला, मीठा और कुरकुरा होता है, जिसके कारण बाजारों में इसकी जबरदस्त मांग है। अपनी बेहतरीन क्वालिटी और लंबी शेल्फ लाइफ (जल्दी खराब न होने का गुण) की वजह से इसे दूरदराज के बाजारों तक बिना किसी भारी-भरकम कोल्ड चेन के भी आसानी से भेजा जा सकता है। यही वजह है कि आज इस नाशपाती का जादू केवल रायपुर, बिलासपुर या दुर्ग-भिलाई जैसे छत्तीसगढ़ के बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके स्वाद की धमक पड़ोसी राज्यों जैसे झारखंड, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल के बाजारों में भी सिर चढ़कर बोल रही है।
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चूंकि मध्य भारत में स्थित होने के कारण जशपुर से इन राज्यों के बाजारों तक पहुंचना बेहद आसान है, इसलिए ट्रांसपोर्ट का खर्च भी बहुत कम आता है। सीजन के दौरान व्यापारी सीधे किसानों के खेतों में पहुंचकर नकद भुगतान के साथ माल उठा रहे हैं, जिससे किसानों को बिचौलियों के चंगुल से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है। धान जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक मुनाफे ने किसानों की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। अपनी तकदीर बदलते देख जशपुर के किसान बेहद उत्साहित हैं और इस रसीली तरक्की के लिए शासन की नीतियों व आधुनिक कृषि योजनाओं का सहर्ष आभार व्यक्त कर रहे हैं।

