धर्म डेस्क
इस्लामी कैलेंडर के सबसे पवित्र महीनों में शुमार मुहर्रम की शुरुआत के साथ ही नया हिजरी वर्ष 1448 का आगाज हो चुका है। यह महीना न केवल नए वर्ष का प्रतीक है, बल्कि त्याग, बलिदान, सत्य और न्याय के प्रति समर्पण की याद दिलाने वाला एक महत्वपूर्ण कालखंड भी माना जाता है। दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय के लिए यह महीना श्रद्धा, इबादत और आत्मचिंतन का समय होता है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार, इस वर्ष 17 जून से नए इस्लामी साल की शुरुआत हुई है और इसी क्रम में मुहर्रम का दसवां दिन यानी यौम-ए-आशूरा 26 जून, शुक्रवार को मनाया जा रहा है।
मुहर्रम के दसवें दिन को आशूरा कहा जाता है, जिसका इस्लामी इतिहास में विशेष महत्व है। इस दिन पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद किया जाता है। वर्ष 680 ईस्वी में इराक के कर्बला के मैदान में हुई वह ऐतिहासिक घटना आज भी न्याय के लिए संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। उस दौर में इमाम हुसैन और उनके 72 समर्थकों का सामना तत्कालीन शासक यजीद की विशाल सेना से हुआ था। संख्या में बेहद कम होने के बावजूद, इमाम हुसैन ने अन्याय के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया और सत्य की रक्षा के लिए अपनी शहादत देना स्वीकार किया।
कर्बला की इसी महान कुर्बानी की याद में मुहर्रम के दसवें दिन को लोग मातम और इबादत के साथ मनाते हैं। गम और आत्मचिंतन के इस महीने में लोग इमाम हुसैन के संदेशों को याद करते हैं और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। यौम-ए-आशूरा का यह दिन दुनिया को सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। आज के समय में भी इमाम हुसैन की शहादत युवाओं और समाज के लिए प्रेरणा का एक ऐसा स्रोत है, जो मानवीय मूल्यों और न्याय की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करने का संदेश देता है।

