देश भर में सड़क सुरक्षा के नियमों को कड़ाई से लागू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि व्यावसायिक एवं परिवहन वाहनों में स्पीड गवर्नर (Speed Governor) लगाने से जुड़े नियमों का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित किया जाए। शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि केंद्रीय मोटर वाहन नियम (CMVR), 1989 के नियम 118 के तहत अधिसूचित परिवहन वाहनों में स्पीड लिमिटिंग डिवाइस (SLD) या स्पीड लिमिटिंग फंक्शन (SLF) लगाने का वैधानिक प्रावधान पहले से मौजूद है, लेकिन इसका धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एक ऐसी मजबूत व्यवस्था बनानी होगी, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जब भी कोई डीलर नया परिवहन वाहन बेचे, तो वह अनिवार्य रूप से प्री-फिटेड स्पीड लिमिटिंग डिवाइस के साथ ही बाहर निकले। 13 मई की पिछली सुनवाई का हवाला देते हुए अदालत ने याद दिलाया कि वाहन निर्माता निर्माण के समय ही इन उपकरणों को लगाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं। केंद्र सरकार द्वारा वाहन निर्माताओं के साथ जून में हुई बैठक की जानकारी देने पर पीठ ने मंत्रालय को निर्माताओं के साथ हुई बातचीत और वाहनों में फैक्ट्री-फिटेड SLD लगाने को लेकर की गई ठोस कार्रवाई का पूरा विवरण अगली सुनवाई में रिकॉर्ड पर रखने का आदेश दिया।
स्पीड गवर्नर के अलावा सार्वजनिक सेवा वाहनों (Public Service Vehicles) में सुरक्षा उपकरणों को लेकर भी अदालत ने कड़ा रुख दिखाया। CMVR के नियम 125H का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि सभी यात्री वाहनों में व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) और इमरजेंसी (पैनिक) बटन होना अनिवार्य है। अदालत ने पूर्व में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की थी कि देश में 1 प्रतिशत से भी कम वाहनों में ट्रैकिंग सिस्टम सक्रिय है, जबकि यह तकनीक महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की यात्रा सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे नियम 125H के अनुपालन और प्रवर्तन की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करें। इसके अलावा, अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा जून में गठित ‘राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड’ (National Road Safety Board) की वास्तविक स्थिति पर भी जवाब तलब करते हुए पूछा कि क्या यह बोर्ड वर्तमान में पूरी तरह कार्यरत हो चुका है।
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सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के पास पैदल यात्रियों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठा। कोर्ट की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने सुझाव दिया कि केवल रेड लाइट पर्याप्त नहीं है, बल्कि हाई कोर्ट आने वाले वकीलों, कर्मचारियों और आम लोगों की सुरक्षा के लिए वहां स्पीड ब्रेकर, रंबल स्ट्रिप्स और वाहनों की गति नियंत्रित करने के तकनीकी उपाय किए जाने चाहिए। उन्होंने पैदल यात्रियों और ट्रैफिक के अध्ययन के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की सिफारिश की। केंद्र सरकार के वकील द्वारा समाधान तलाशने की बात कहे जाने पर पीठ ने दो टूक टिप्पणी करते हुए कहा कि “भारत में समाधान बहुत बेहतर होने चाहिए।”























