देश में बिछा जल परीक्षण प्रयोगशालाओं का जाल, अब आपके नल के पानी पर होगी पैनी नजर
जशपुर का संकट: एक विश्लेषण फैज़ान अशरफ
जशपुर, जिसे अपनी मखमली हरियाली और शीतल आबोहवा के कारण ‘छत्तीसगढ़ का स्विट्जरलैंड’ कहा जाता है, आज एक खामोश जल-आपातकाल की दहलीज पर खड़ा है। ऊपर से शांत और समृद्ध दिखने वाली यह धरती भीतर से खोखली और थकी हुई महसूस हो रही है।
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जिले की भौगोलिक बुनावट ही इसके वर्तमान संकट की पटकथा लिख रही है। जहाँ एक ओर बगीचा, सन्ना और पंडरापाठ जैसे ऊँचे क्षेत्रों में ढालू और पथरीली जमीन के कारण बारिश का पानी ठहरने के बजाय तेजी से बह जाता है, वहीं जशपुर और मनोरा का बेल्ट एक ‘रन-ऑफ ज़ोन’ में तब्दील हो चुका है।
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इस प्राकृतिक बनावट का खामियाजा ईब जैसी जीवनदायिनी नदियों को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी जलधारा अब गर्मियों के आते ही कमजोर पड़ने लगी है।मैदानी इलाकों की स्थिति और भी भयावह है। पत्थलगांव, कुनकुरी और कांसाबेल जैसे क्षेत्रों में खेती और बढ़ते शहरीकरण के दबाव ने पाताल को छलनी कर दिया है।
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सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड के डरावने आंकड़े बताते हैं कि पत्थलगांव अब ‘सेमी-क्रिटिकल’ श्रेणी में है। यहाँ पानी निकालने की रफ्तार प्रकृति द्वारा उसे दोबारा भरने की क्षमता से कहीं ज्यादा हो चुकी है। दशक भर पहले जहाँ महज 200 फीट पर पानी मिल जाता था, आज वहां 800 फीट की गहराई तक ड्रिलिंग मशीनों के शोर के बावजूद प्यास नहीं बुझ पा रही। लुड़ेग और पाकरगांव जैसे गांव, जो अपनी टमाटर की खेती के लिए मशहूर हैं, अब अनियंत्रित बोरिंग के कारण जल-संकट के ‘हॉटस्पॉट’ बन चुके हैं।

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इस जल-त्रासदी के पीछे मानवीय हस्तक्षेप के गहरे निशान हैं। बगीचा के जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने जमीन की उस ‘स्पंज’ जैसी क्षमता को खत्म कर दिया है जो पानी को सोखकर भीतर संचित करती थी।
इसके साथ ही, नदियों से हो रहे अवैध रेत उत्खनन ने ईब और मैनी जैसी नदियों के प्राकृतिक जल-स्तर (Water Bed) को ही बिगाड़ दिया है। जशपुर और कुनकुरी जैसे शहरों में कंक्रीट का जाल तो बिछ गया, लेकिन 90 प्रतिशत घरों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग का न होना भविष्य के प्रति हमारी लापरवाही का सबसे बड़ा सबूत है। आज जिले का नक्शा चेतावनी के रंगों में बंटा है—पत्थलगांव लाल (रेड ज़ोन) होकर खतरे का संकेत दे रहा है, तो कुनकुरी और कांसाबेल तेजी से नारंगी (ऑरेंज ज़ोन) की ओर बढ़ रहे हैं।
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हालांकि प्रशासन कई योजनाओं के माध्यम से नालों के उपचार और स्टॉप डैम बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन जशपुर की समस्या केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन की भारी कमी है। अब समय आ गया है कि जशपुर के लिए एक नई और वैज्ञानिक रणनीति अपनाई जाए। हमें डिजिटल एक्वीफर मैपिंग की जरूरत है ताकि पता चल सके कि किस ब्लॉक के नीचे कितना पानी शेष है।
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बड़े बोरवेलों पर सेंसर लगाना, टपक सिंचाई (Drip Irrigation) को अनिवार्य करना और बगीचा-सन्ना के ढलानों पर कंटूर ट्रेंचिंग के जरिए बारिश के पानी को रोकना अब विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी है।
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अंततः, यह केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं है, बल्कि जशपुर की सभ्यता और संस्कृति को बचाने की जंग है। यदि यहाँ के सात सौ से अधिक गाँवों ने ‘एक गाँव-एक तालाब’ और हर नागरिक ने ‘एक घर-एक सोखता’ का संकल्प नहीं लिया, तो वह दिन दूर नहीं जब जशपुर की पहचान केवल स्मृति बनकर रह जाएगी।
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