**जशपुर:**
छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला कृषि और बागवानी के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश कर रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में जिले के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ फलों की व्यावसायिक खेती के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी का परिणाम है कि जशपुर अब देश के मानचित्र पर फलों के एक नए केंद्र के रूप में उभर रहा है।

जिला प्रशासन और रूरल डेवलपमेंट एंड डेवलपमेंट सोसायटी (नाबार्ड) के संयुक्त प्रयासों से जशपुर के मनोरा और बगीचा विकासखंड में सेब की खेती का प्रयोग पूरी तरह सफल रहा है। इस अभिनव पहल ने न केवल क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को बदला है, बल्कि स्थानीय किसानों की आर्थिक स्थिति को भी नई मजबूती प्रदान की है।

वर्ष 2023 में हुई थी शुरुआत, अब 410 एकड़ में विस्तार
जशपुर जिले के आदिवासी किसानों ने वर्ष 2023 में पहली बार सेब की खेती की शुरुआत की थी। वर्तमान में जिले के कुल 410 किसान इस परियोजना से सीधे जुड़े हुए हैं। इस मॉडल की खास बात यह है कि प्रत्येक किसान ने अपनी एक एकड़ भूमि पर सेब के पौधों का रोपण किया है, जिससे अब कुल 410 एकड़ क्षेत्र में सेब के बागान लहलहा रहे हैं। इस वर्ष इन पौधों में उत्कृष्ट गुणवत्ता और बेहतर आकार के फल आए हैं, जिससे किसानों के चेहरे खिल उठे हैं।
रूरल डेवलपमेंट एंड डेवलपमेंट सोसायटी के अध्यक्ष श्री राजेश गुप्ता ने बताया कि जशपुर के किसान अब धान के अलावा अन्य नकदी फसलों को तेजी से अपना रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में सेब की खेती का रकबा और अधिक बढ़ेगा।

**अनुकूल जलवायु और बेहतरीन स्वाद**
विशेषज्ञों के अनुसार, जशपुर के मनोरा और बगीचा विकासखंड की भौगोलिक स्थिति, यहाँ का तापमान और जलवायु सेब की बागवानी के लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं। वर्तमान में मनोरा विकासखंड के शैला, छतौरी, करदना और बगीचा विकासखंड के ग्राम छिछली सहित आस-पास के गांवों में सेब का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है।
स्थानीय उत्पादक किसानों का कहना है कि जशपुर में उपजे सेब का स्वाद, कड़कपन और गुणवत्ता देश के प्रमुख सेब उत्पादक राज्यों जैसे कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेबों की तुलना में किसी भी तरह कम नहीं है। स्थानीय बाजार में भी इन सेबों को लेकर अच्छा रुझान देखा जा रहा है।

जीवन स्तर में आ रहा है सुधार
फलों की खेती को मुख्यधारा में शामिल करने से जशपुर के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बड़ा सामाजिक-आर्थिक बदलाव आ रहा है। धान जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भरता कम होने से किसानों को अब सालभर नियमित और अधिक आय प्राप्त हो रही है। इस आर्थिक सुदृढ़ता से किसानों के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हो रहा है और वे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं। जिला प्रशासन की इस पहल को बस्तर और सरगुजा संभाग के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भी एक रोल मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

